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असभ्य पत्रकारिता?

Suyash Varma

BySuyash Varma

Sep 8, 2020

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Business newspaper article
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अपने पत्रकारिता की पढाई ख़त्म करने के बाद मै उस क्षेत्र से रूबरू हुआ  जहाँ शब्दों की गहराई व्यक्ति की उंचाई तय करती है. एक साल से अपने शिक्षको का  लगातार संरक्षण एवं मार्गदर्शन प्राप्त होने के बाद एक विचित्र सी उर्जा से मै परिपूर्ण हो गया. विषय ज्ञान , कलम की ताकत , ओजस्वी वक्ता एवं चुम्बकीये व्यक्तित्व – कुछ ऐसे विशेषण मुझे बताये गए जो एक पत्रकार की पहचान बनाते हैं.

एक दिन ऐसे ही पत्रकारिता क़ी महानता का लबादा ओढ़े मै घूम रहा था कि एक नौजवान व्यक्ति ने पूछ दिया “धूर्तता के शासकीय चट्टान की नीचे दबे आम आदमी के लिए मीडिया क्या कर रही है? लोकतंत्र में वाणी की स्वतंत्रता देश के चरित्र पर सवालिया निशान क्यों पैदा कर रही? क्या निष्पक्ष , सभ्य , शिष्ट पत्रकारों का विलोप हो गया है ?”.

असभ्य असंस्कृत एवं अशिष्ट निरुपित कर दिए जाने पर एक क्षण में मेरी विशिष्टता कि छवि धूमिल हो गयी. उसके सवालो के साथ मेरे मन ने भी अपने विचारो कि दस्तक दे दी – क्या खुद को जनता क़ी आवाज़ कहने वाली मीडिया जनता के नज़रो में इतनी गिर गयी है ? या फिर ये सच्चाई के रास्ते पर चल रहे लोगो को हतोत्साहित करने कि साजिश है?

जब कभी पत्रकारिता के इतिहास को देखता हू तो गौरवान्वित महसूस करता हू. पर ज्योंही आज कि तारीख से उसे जोड़ देता हुआ ऐसा प्रतीत होता है कि पत्रकारिता अपना ध्येय खो चुकी है. कलम कि ताकत पैसो कि चमक के आगे फीकी पड़ गयी.

पत्रकारिता अब एक मिशन नहीं बल्कि व्यवसाय बन चुकी  है. और इस व्यवसाय ने नए एवं उभरते पत्रकारों के मानसिकता पर एक अविनाशी कुठाराघात किया है – उन पत्रकारों पर जिनकी सोच यह कहती है कि पत्रकारों का दायित्व और भी नैतिक हो चुका है.


पिछले कुछ रिपोर्ट को एक आलोचक के तौर पर देखता हू तो समझ में आता है कि कैसे बड़े बड़े घोटाले सामने आये लेकिन आजतक गाँधी परिवार पर एक भी आंच नहीं आई. देश कि सबसे बड़ी सामाजिक छवि सोनिया गाँधी कि हर जानकारी को किस प्रकार से निजी रखा गया. क्यों अन्ना हजारे को इस ऊंचाई तक पंहुचा देने वाली मीडिया काले धन का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं कर पायी? कैसे हर छोटी और बड़ी राष्ट्र संगठन कि गतिविधियों का हिंदुत्व आंतकवाद के नाम पर गला घोट दिया गया.कैसे हर आतंकवादी गतिविधियों के कसूरवार मुस्लिम ठहराए गए? कैसे उत्तर प्रदेश चुनावो के बीच सलमान रुश्दी के नाम को उछाला गया और कैसे हर दुसरे दिन पश्चिम बंगाल में हो रहे हर अपराध का ठीकरा तृणमूल कांग्रेस के सर फोड़ा गया.

जब इन सारी रिपोर्ट को देखता हू तो मन कि कोमल सतह को अपराध बोध कुरेदने लगता है. आखिर कहाँ गयी मीडिया कि वह निष्पक्ष प्रविर्ती? हमारे संस्कार , हमारे सिद्धांत तब कहाँ चल जाते हैं जब हम भूख से तड़पते बच्चो को छोड़कर दिग्विजय सिंह के निराधार व्यक्तव्यो के पीछे भागते हैं? हमारे कलम क़ी तेज़ शक्तिशाली लोगो के सामने क्यों निर्जीव स्वरुप हो जाती है?

मेरी सोच ये है क़ी अगर व्यवस्था गलत है तो उसको सुधारने क़ी जिम्मेवारी भी हमारी है. पत्रकारिता भले ही अपना संतुलन खो बैठी हो पर आज भी ऐसे पत्रकार जीवित है जिनके शब्दों के साथ उनका जीवन बोलता है. जिन्होंने कभी नैतिक तौर पर समझौता नहीं किया , जिन्होंने अपने संयमित जीवन से “पत्रकार” शब्द को चरितार्थ किया. आज ये कनिष्ट उन सभी पत्रकारों को सलाम करता है जिनकी कलम उठी तो सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन के लिए, शायद समाज ने उन्हें नहीं पहचाना लेकिन उनकी लेखनी युग युगांतर तक जीवंत रहेगी !!

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