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“आज़ाद” कश्मीर की गुलाम सोच !

Suyash Varma

BySuyash Varma

Sep 8, 2020

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इंसान की हैवानियत जब अपने चरम पर होती है तो अक्सर वो मजहब को अपने स्वार्थ सिद्धि का एक जरिया बना लेता है। ऐसा ही कुछ हो रहा है कश्मीर में। कुछ दिनों पहले एक महानुभाव ने कहा की इस्लाम में संगीत हराम है और आज लडकियों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया।

इस्लाम धर्म के इस तथाकथिक प्रवक्ता ने शायद अपने धर्म का अच्छे से अध्ययन नहीं किया है। गौरतलब ये है की ऐसे ही कुछ लोग बीतो दिनों से “आजाद कश्मीर” के लिए “लड़ाई” लड़ रहे हैं। ये बयान बहुत अच्छी तरह से दर्शाता है की किस प्रकार की आज़ादी चाहते है ये लोग – मजहबी तानाशाही की या फिर लोगो की !ऐसा कैसे हो सकता है की जिस ख़ुदा ने इंसान को बनाया वो उसके लिबाज़ कला संस्कृति से उसे पहचाने? जैसा की नस्र्रुदीन शाह ने कहा था “दीन में दाढ़ी होती है, दाढ़ी में दीन नहीं” . शायद ये धर्म प्रवर्तक भूल रहे हैं की नमाज़ भी एक प्रकार का संगीत है और ख़ुदा अपनी तारीफ़ सुनने के लिए किसी “हराम” चीज़ की वकालत नहीं करेगा।

संगीत जगत में कई ऐसे बड़े नाम है जिन्होंने ने संगीत को एक नया रूप दिया, और वो मुसलमान थे, सच्चे मुसलमान !

मजहब का लिबादा ओढ़े ऐसे लोग “हराम की कमाई जेब में रख कर हलाल गोस्त की दूकान ढूंढते हैं ” और इस्लाम की एक निहायत गलत तस्वीर दिखा के आज के युवाओ को  जज्बाती करते है ताकि उनका राजनितिक एजेंडा पूरा हो ! मौलवी साहब, आपने अपने मजहब को जितना नहीं समझा उतना हम युवाओ ने इंसानियत को समझ लिया है, आप अपने शब्दों के सीढिया बनाते रहिये और हम  उन्ही सीढियों पर पैर रखकर आगे बढ़ते जायेंगे !

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