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मजहबी आतंकी

Suyash Varma

BySuyash Varma

Sep 8, 2020

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तथाकथित भारतीय बुद्धिजीवियों ने एक नया टोटका अपनाया है – सोशल मीडिया। मजहब को स्वार्थ सिद्धि का ज़रिया बनाना हमारी फितरत हो गयी है। विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति के वंसज जब मजहब और आतंक की असमानता को अनदेखा कर दे तो उस से दयनीय स्थिति कुछ नहीं हो सकती। वैसे आतंकवाद को धार्मिक चेहरा देने की पद्धति पुरानी रही है। मै बस एक सवाल करना चाहूंगा – 22 साल पहले जब याकूब को पकड़ा गया था तो कहाँ गयी थी आपकी ये हमदर्दी ? मै मृत्युदंड की प्रासंगिकता की बात नहीं कर रहा बल्कि इस तर्क के पीछे चल रहे कलंकित मंसूबे पर ध्यान आकर्षित करना चाह रहा।

1993 के नरसंहार को एक धार्मिक लबादे से बचाना जघन्य अपराध है। और ये सब नाटक किस के लिए? एक आतंकी जिसने यह सुनिश्चित किया की बम ऐसी जगह लगाये जाए जहाँ ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगो मारे जा सके। अगर आप न्याय की बात कर रहे हैं तो जाकर उस लड़के से पूछिये जिसके पिता कभी शाम को लौट कर नहीं आये. उस लड़के को याकूब सरीखे लोगों ने २२ साल नहीं दिए – एक पल में सब खत्म कर दिया। एक बात साफ़ है की याकूब आंतकी था और उसे वही मिला जो आतंकियों के साथ होना चाहिए। जैसा की कहा जाता है – न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का होता है। अपने धर्मांध भाइयों से ये भी बताना चाहूंगा की आपके कौम के भी लोगों की जाने गयी थी। इस्लाम की एक गलत तस्वीर दिखाने वाले उन राजनीतिक कीड़ो से दूर रहना उचित है।

सोशल मीडिया के जरिये युवाओं की मानसकिता को आतंकी एवं देशद्रोही गतिविधियों के तरफ बढ़ाना एक सोची समझी साजिश के शुरुआती पल हैं। अब शायद वक़्त आ गया है की भारतीय अपनी अखंड एकता का परिचय देकर विश्व स्तर पर एक वैचारिक समरसता की मिशाल कायम करें। हालाँकि लोकतंत्र में वैचारिक समरसता एक परिकल्पना मात्र है।

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