शादी ब्याह और हम


बाबुल जो तूने सिखाया ,
वही ले साजन घर मैं चली ।
अक्सर हम यह गाना आय दिन किसी न किसी की शादियों में सुनते रहते होंगे । मगर क्या आपको कभी ऐसा लगा की यह जो शादी हो रही है वह वर वधु की मर्ज़ी से हो रही है या नहीं ,यह सारी बाटे शायद आपको कभी परेशां नहीं करती होंगी क्योकि हमरे लिए शादी बयाह तो एक मेला है जिसमे हर मेहमान खुद को सजाने और खुद के पेट भरने और सेल्फी लेने से फुर्सत नहीं मिलती । कुछ ऐसी भी लोग होते है जो उस बेटी के बाप की करनी पर मज़ाक उड़ाते है – कहते है की खाना अच्छा नहीं है इंतज़ामात अच्छे नहीं है , कपडे अच्छे नहीं है और पता नहीं क्या क्या । इस कोरोना ने शायद कुछ बेटियों के पिता की ज़िन्दगी बना दी काम खर्चे में बेटी बीहा दी ।
इसमें भी कुछ लोगो को रहत न मिली खाने लगे की पैसे खर्च नहीं करने थे , हमें बुलाना नहीं था इसलिए शादी लॉकडाउने में शादी करादी । शादी ब्याह में एक बाटे बड़ी प्रचलित है की अगर लड़की लव मर्रिज करे मगर अपनी जात में तो सही और अगर किसी और जात में करे तो बातचलन , सरकारी नौकरी वाले लड़के से करे तो दहेज़ ज्यादा दी होगा इसका पापा ने । प्राइवेट नौकरी वाले लड़के से करे तो बेचारी गरीब की बेटी है । शायद अपने भी यह सारी बाटे किसी की बेटी के लिए कही होगी ।

यह शादी ब्याह की कहनी राजा लोगो से शुरू हुआ था । विभिन राज्यों के राजा कभी अपने राज की राजकुमारी से शादी नहीं करता । आप कहेंगे राज जितने के लिए । महाभारत में शांतनु ने मलाह से शादी की थी । तब उनपर किसी ने लांछन नहीं लगया तो आज जब कोई किसी दूसरी जाती में विवाह करता है तो लांछन को लगया जाता है , उसके चरित्र पर ऊँगली क्यों उठाई जाती है ।
कहा जाता है की हमारा वर्त्तमान हमारे अतीत अर्थात इतिहास का हिंसा होता है । हमारा आज का समज भी हमरे अतीत के समझ का हिस्सा है । जब महाभारत काल में अंतर जातीय विवाह की मंजूरी देता था , तो आज के समज को इससे इतनी आपत्ति को होती है । को आज का समज अंतर जाती विवाह करने वाले दम्पतियो को हिन् भाव से देखता है ।
आज का समज कुछ अलग है , आज का भारत अलग है मगर सोच आज भी वही है । हमरे माता पिता एक बार के लिए लव मर्रिज के लिए मन जाए , मगर समाज के ताने उन्हें उनके कदम पीछे किचन के लिए मजबूर कर देते है । अपने बच्चो के प्रेम की आहुति देने पर मजबूर कर देते है । ऐसा समज का हिंसा होने पर मुझे अत्यंत ग्लानि होती है । घिन अति है ऐसे समज का हिंसा होने पर जहा जात पात रंग भेद अपनी चरण सिमा पर है , जहा समाज अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी बलि चढ़ा देते है

Comments

Aduiti Shreya

I am a dream aspirant,  I aspire my dream as I don't want my dreams to be hallucination I want it to be a reality and for that, I am ready to give my best