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जाति भेद कब वाज़िब था?

Arpana Kumari

ByArpana Kumari

Nov 12, 2020

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हम यह जानते हैं कि जाति भेद कई समय से हमारे समाज में मौजूद है। और यह कहना गलत नहीँ होगा कि हमारे पूर्वज इसे पूरी श्रद्धा से निभाते थें।

जाति की शुरुआत

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जाति भेद की शुरुआत कब और क्यों हुई?

हिन्दी साहित्य के अनुसार जाति को चार वर्णों में बाँटा गया।
जो लोग पूजा पाठ या शिक्षा अर्जित करते थें उन्हें ब्राह्मण नाम दिया गया, जो शासक और योद्धा थे उन्हें क्षत्रिय कहा गया, खेती और व्यापार करने वाले लोगों को वैश्य और मजदूरी करने वालों को शूद्र कहा गया।

इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि जाति निर्धारित करने का काम किसीको नीचा दिखाने के लिए नहीँ बल्कि सबको काम निर्धारित करने के लिए किया गया था। ताकि
चीज़ों को आसान बनाया जा सके, और हर काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे।

महाभारत में जाति भेद

हमारे लिए महाभारत एक ऐसी कहानी है जिससे हम बहुत कुछ सीखते हैं। पर क्या आप यह जानते हैं कि इसमें भी जाति भेद देखने को मिलता है?

महाभारत में एक घटना हुई थी जब हस्तिनापुर में राजा के पद के लिए युधिष्ठिर या दुर्योधन में से किसीको चुनना था। दोनों की परीक्षा लेने के लिए एक समस्या का समाधान उनसे माँगा गया।
समस्या यह थी कि एक हत्या में चार लोग शामिल थे, एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य और एक शूद्र। इनके लिए सबसे उपयुक्त समाधान क्या होगा जिससे सबको न्याय मिले? यह सुनते ही दुर्योधन ने चारों को मृत्यु दंड देने की घोषणा कर दी। उनका कहना था कि परम्परा के अनुसार मृत्यु की सज़ा मृत्यु दंड ही है। और ज़ाहिर सी बात है, यही करना न्याय दिलाएगा।
जब युधिष्ठिर से पूछा गया तो उन्होंने सबको एक सज़ा नहीँ दी। शूद्र को उन्होंने चार वर्ष कि सज़ा सुनाई, वैश्य को आठ वर्ष की, क्षत्रिय को सोलह वर्ष की और क्योंकि ब्राह्मणों को मृत्यदंड नहीँ दिया जाता तो उनका दंड उन्होंने महाराज पर छोड़ दिया। यह सुनकर उनसे सवाल किया गया, अप्राद एक तो दंड चार क्यों? तो उन्होंने बताया कि अपराध एक नहीँ है, शूद्र का अपराध एक अज्ञानी का अपराध है इसलिए चार साल का दंड, परंतु वैश्य उतना भी अज्ञानी नहीँ इसलिए सज़ा दुगनी है। क्षत्रिय समाज का रक्षक है, अगर वही अपराधी हो तो उसका दंड और दुगना होगा, और ब्राह्मण ज्ञानी है, अगर उसने अपराध किया है तो उह सबसे बड़ा अपराध है।
इस जवाब से सब प्रसन्न थे और युधिष्ठिर को राजा घोषित किया गया।

इससे यह तो पता चलता है कि जाति सिर्फ शिक्षा और काम में अलग है। इससे कोई दूसरे को नीचा नहीँ दिखा सकता। या हम ऐसा नहीँ कह सकते कि कोई एक जाति दूसरे से ऊँची है। सभी अती आवश्यक हैं।

क्या अब जाति की आवश्यकता है?

पहले की बात हम मान सकते हैं कि काम बाँटने के लिए जाति आवश्यक माना गया था। पर अब जब हमारी शिक्षा स्कूल में होती है, जहाँ हर बच्चा बैठकर शिक्षा ले सकता है, ऐसे समाज में क्या जाति की आवश्यकता है? अब जिसको जो शिक्षा लेनी हो ले सकता है, कोई रोक नहीँ है तब जाति में बंटे रहने का क्या लाभ?
यह कुछ सवाल हैं जो हमें खुदसे पूछना चाहिए और इस विषय पर गहराई से सोंचना चाहिए ताकि समाज में जाति भेद कम हो सके। क्योंकि अब समय है एक दूसरे के साथ खड़े होने का और समाज में आवश्यक बदलाव लाने का।

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