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जातिवाद: अनुशासन या अभिशाप?

Ritu Rani

ByRitu Rani

Nov 29, 2020

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man pumping water on water pump

भारत में जातिवाद प्राचीन काल से ही मौजूद है, जो एक सामाजिक बुराई की तरह फैली हुई है। हालांकि इस अवधारणा को सत्ता में बैठे लोगों द्वारा सदियों से सत्ता के अनुरूप ढाला और विकसित किया गया है। जातिवाद राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती में से एक है। भारत जैसे देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण और खतरनाक पांच चुनौतियाँ हैं – असमानता (Inequality), निरक्षरता (Illiteracy), क्षेत्रवाद (Regionalism), आतंक (Terrorism) और जातिवाद (Casteism) , इन चुनौतियों को पूरा करने के बाद ही भारत में लोकतंत्र सफल हो पाएगा ।

जातिवाद दो शब्दों से बना है, ‘जाति और वाद’ । ‘जाति’ शब्द का उद्भव ‘पुर्तगीज’ (Portuguese) शब्द ‘कास्टा’ (Casta) से हुआ है । वाद का अर्थ होता है ‘सोच’ । जातिवाद एक तरह की सोच है जो लोगों को कुछ ऐसी चीजों में बांध रही है, जिसके बारे में लोगों को पता ही नहीं है । लोगों को इतना तक पता नहीं की जाति बोला किसे जाता है? जाति है क्या? आधुनिकतौर पर जिसे हम जाति मानकर चल रहे हैं , वो जाति है ही नहीं, उसे उपजाति कहते हैं।

जाति का मतलब होता है “किसी समुदाय में कुछ लोगों में सब कुछ समान होना, उसे जाति कहते हैं”, जैसे कि सबसे पहले शास्त्रों में दो जातियां थी पुरुष जाति और स्त्री जाति। सामाजिक तौर तरीके के अनुसार, आधुनिक युग में जाति को रक्त में भी विभाजित किया गया।

वैदिक काल में जाति नहीं थी और जाति से पहले वर्ण व्यवस्था थी। शास्त्रों के आधार पर सबसे पहले मनुष्यों को चार वर्णों में व्यवस्थित किया गया ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । भगवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है “कर्म को सहज रूप में जानने के लिए जाति होना जरूरी है”। इसका मतलब ये है जिसको जो काम करने में अच्छा लगेगा, उसके अनुसार उसे वर्ण दिया जायेगा और उस वर्ण के अनुसार उसे जाति मिलेगी। जो लोग वीर का कार्य किए उसे क्षत्रिय वर्ण में विभाजित कर उन्हें जातियां दी गई और जो लोग ईश्वर की आराधना में लग गए, उन्हें ब्राह्मण वर्ण में विभाजित कर उन्हें जातियां दी गई। वर्ण का एक मतलब है ‘अक्षर’ और दूसरा ‘रंग’। जब वर्ण व्यवस्था की शुरुआत परवर्ती वैदिक युग में हुई थी, तब लोगों से पूछा जा रहा था कि वे किस वर्ण को लेंगे? इन चार तरह के वर्णों से बहुत सारी जातियां निकली और फिर गोत्र। शास्त्रों में कहा गया है, परवर्ती वैदिक युग में जब वर्ण व्यवस्था हुई थी, तब लोगों से पूछा गया कि वो किसे अपना पूर्वज मानेंगे? फिर लोगों ने सप्तऋषि में से एक – एक ऋषि को अपना पूर्वज माना। जिन्होंने कहा कि वे नागस्य ऋषि के वंशुदा है, वे नागस्य गोत्र माने गए, जिन्होंने कहा कि वे गौतम ऋषि के वंशुदा है, वे गौतम गोत्र माने गए और जिन्होंने कश्यप ऋषि को वंशुदा माना, वे कश्यप गोत्र माने गए । दूसरे शब्दों में बोला जाए तो गोत्र का मतलब होता है – “पूर्वज” ।

ब्राह्मण और क्षत्रिय, जिन्हें उच्च श्रेणी का दर्जा दिया गया और वैश्य जिन्हें व्यापारियों का दर्जा मिला और फिर बचे शूद्र जिन्हें सेवक का दर्जा मिला, जो बाकी के वर्णों के लिए सेवक का कार्य करेंगे। सभी वर्णों के लोग अपने वर्णों का विभाजन किया, जिसे जाति कहा गया। ऐसा करने का मुख्य कारण आठ तरीके के विवाह में से एक विवाह था “दैवीय विवाह”। दैवीय विवाह के आधार पर ब्राह्मण को कन्या दान देना पड़ता था, चाहे ब्राह्मण बुजुर्ग ही क्यों ना हो। जब वैश्य और शूद्र की कन्या ब्राह्मण के घर जाती थी तो उन्हें पत्नी का दर्ज़ा भी नहीं दिया जाता था, उन्हें ये बोलकर कार्य कराया जाता था कि वो शूद्र है और शूद्रों का कार्य है सेवा करना। उनपर अत्याचार इतने बढ़ गए कि शूद्र वर्ण के लोगों ने वर्णों के भीतर ही विभाजन कर दिया और शूद्र श्रेणी के लोग खुद को अछूत बताया। ब्राह्मण और क्षत्रिय द्वारा शूद्र औरतों पर अत्याचार से बचाव की वजह से खुद को अस्पृश्य बताया और कहा कि वे निम्न जाति के हैं।

मनुस्मृति में भी अस्पृश्य के बारे में वर्णन किया गया है और ये बात लोगों तक फैलाई कि जहां ब्राह्मण लोग होंगे वहां शूद्र लोग नहीं आ सकते। अगर शूद्र लोग वहां गए तो उनके कान में लोहे की कील चुभा दी जाएगी। इस तरह की कठिन व्यवस्था की शुरुआत मनुस्मृति में हो गई और ऐसी ही दण्ड व्यवस्था हो गई। शूद्र वर्ण के लोग खुद को अछूत बनाने के लिए तैयार हो गए ताकि उनकी औरतों पर किसी भी प्रकार का जुल्म ना हो और ना ही शूद्र कन्याओं की कमी हो। जब उच्च वर्ण के लोग निम्न वर्ण पर अत्याचार नहीं कर पाए तो उच्च वर्ण के लोगों ने नया नियम बनाया, जिसे “जाति” नाम दिया गया। जिसके अनुसार वर्णों का विभाजन कर दिया गया। अब शूद्रों में भी शूद्र ब्राह्मण हुए और ब्राह्मण में भी शूद्र हुए। इसका मतलब ये था कि शूद्र ब्राह्मण सिर्फ शूद्र वर्ण के लिए काम करेगा और ब्राह्मण के बीच विभाजन में जो उच्च ब्राह्मण हुए, वो सिर्फ पूजा करेंगे, जो शासक ब्राह्मण हुए, वो सिर्फ शासन करेंगे और कुछ ब्राह्मण खेती बाड़ी करेंगे। इसके पश्चात जाति में से उपजातियां निकली, जिसे अब के लोग जाति समझते हैं और उसके लिए लड़ रहे हैं । इस तरह से जाति का उत्पन्न हुआ ।

जातिवाद राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ा चुनौती है । डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर ने जाति व्यवस्था को बहुत बढ़ावा दिया था और संवैधानिक संरक्षण दिया था। महात्मा गांधी की सोच थी कि जाति व्यवस्था हटा दी जाए और सबको समान दर्जा दी जाए। डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर ने उच्च जाति के लोगों को सामान्य (General) श्रेणी में रख दिया और निम्न जाति के लोगों को ओबीसी, एसटी और एससी श्रेणी में रख दिया। ये जो व्यवस्था लाई गई, उससे पहले लोगों को सिर्फ चार वर्ण का नाम पता था और अपने सारे कार्य वर्ण व्यवस्था के अनुसार कर रहे थे। डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर ने जो व्यवस्था लाई, उस वजह से निम्न जाति के लोगों को जबरदस्ती अपनी जाति प्रमाणित करनी पड़ी और जब तक निम्न जाति के लोग अपनी जाति बताते रहेंगे तब तक जातिवाद भारत में विद्यमान रहेगा। डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर ने महात्मा गांधी से कहा कि जो निम्न जाति के लोग पीछे रह गए हैं उन्हें दस साल के लिए आरक्षण दे दी जाए जिसकी वजह से वे दूसरे के समान हो जायेंगे और जब उनकी स्थिति दस साल बाद सुधर जाएगी, तो उन्हें फिर से सामान्य श्रेणी में रखा जाएगा। सोचने की बात तो यह है कि जिन लोगों को आरक्षण दिया जायेगा, क्या वो खुद को सामान्य श्रेणी में रखने के लिए तैयार होंगे? क्या वो दोबारा आरक्षण लेने की कोशिश नहीं करेंगें? निश्चित रूप से लोग दोबारा आरक्षण लेने की कोशिश करेंगे। जिस कारण से यहां जाति व्यवस्था का स्वरूप बढ़ता गया और लोग इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश करते रहे।

संविधान के अनुसार हम जाति को गलत नहीं बोल सकते हैं। इस आरक्षण व्यवस्था को सिर्फ संविधान के अनुसार ही हटाया जा सकता है। ये आरक्षण तब तक चलेगा जब तक राजनीति चलेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि जितने भी नेता आते हैं वो लोग जातिवाद को बढ़ावा देते हैं। नेता जान बूझकर राजनीति के साथ जातिवाद को मिला देते हैं। नेता जाति के आधार पर संगठन बना लेते हैं।

हमारे संविधान में अनुच्छेद 330 – अनुच्छेद 342 में वर्गों (Classes) का वर्णन किया गया है जो आरक्षण व्यवस्था से सम्बन्धित है। ये अनुच्छेद दर्शाते हैं कि भारत में जाति प्रथा थी, जाति प्रथा है और जाति प्रथा रहेगी तथा भारत में जाति कानूनी रूप से सही है। जब संविधान से स्वीकृति मिली हुई है तो साधारण लोग इनका क्या बिगाड़ सकते हैं। इसी वजह से कुछ असभ्य लोग जातियों के नाम पर बहुत अत्याचार कर रहे हैं।

जातिवाद की वर्तमान स्थिति समाज में व्यापार बन गया है। कुछ लोगों को इस आरक्षण व्यवस्था की ऐसी लत लग गई की वो सामान्य श्रेणी में आना ही नहीं चाहते और संविधान से मिली हुई सुविधा का फायदा उठाना चाहते हैं। जिसकी वजह से सामान्य श्रेणी के लोग में प्रतिभा होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिलती और वे लोग जाति व्यवस्था से इतने परेशान हो जाते हैं कि गुस्से में आतंकवाद की तरफ कदम बढ़ाना सही समझते हैं । नौकरी ना मिलना निराशा के साथ आत्महत्या का भी बहुत बार कारण बन जाती है। जिससे लोग डिप्रेशन जैसे मानसिक स्वास्थ्य का शिकार हो जाते हैं।

जातिवाद के बारे में आज की पीढ़ी को पढ़ाया तो जा रहा है, लेकिन विस्तार से नहीं। हमारे समाज में आधे से ज्यादा लोग जातिवाद के बारे में जानते ही नहीं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्यों वर्णों का विभाजन किया गया और क्यों वर्णों का विभाजन कर जातियां बनाई गई? जातियां बनाई गई थी अनुशासन के लिए ताकि अनुशासित तरीके से वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था चल सके लेकिन आधुनिक युग में ये लोगों के लिए अभिशाप का कारण बन गई है। लोग जानते ही नहीं जाति का सही मतलब क्या है? लोगों को जाति व्यवस्था के बारे में जानने के लिए उन्हें सही शिक्षा के साथ साथ शास्त्रों में जाति के बारे में वर्णन जाति व्यवस्था को भी शामिल करने की जरूरत है ।

“जाति जन्म से नहीं , कर्म से होता है” ।

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