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क्या जातिवाद अभी भी जीवित हैं?

Sabana Praween

BySabana Praween

Oct 17, 2020

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a boy crying tears for his loss
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क्या जातिवाद अभी भी जीवित हैं इसका जवाब देना ज्यादा मुश्किल तो नहीं हैं क्युकी देश मे ऐसी बहुत सी घटनाएं देखने को मिली जिसका संबन्ध या तुलना किया जाएं तो पता चलता हैं कि देश मे तो अभी भी जातिवाद जिंदा हैं। आज हमलोग 21 वी शताब्दी में हैं जहां टेक्नोलॉजी आसमान छू रही हैं, लोग चाँद पर पानी के तलाश में है, ऐसी तकनीक बनती जा रही हैं की जो काम पहले घनटों में समाप्त होते थे उसे अब मिनटों मे समाप्त किया जा सकता हैं , लेकिन अफसोस की बात हैं आज दुनिया चाँद पर पहुँच गयी हैं लेकिन देश मे लोगों की सोच मे परिवर्तन अभी भी किसी -किसी चीजो मे बहुत पिछड़ी हुई हैं ।आज देश में कुछ ऐसे भी इंसान हैं जो परिवर्तनों के साथ नहीं जाना चाहते बल्कि अपनी रूढ़िवादी विचारों के साथ मे चलते नजर आ रहे है। देश मे जिस हिसाब से जाति को ले कर विवाद चलता हैं उससे तो अष्पष्ट् पता चलता हैं कि देश मे जातिवाद जीवित हैं। जातिवाद एक ऐसी प्रणाली है जो प्राचीन काल से चलती आ रही हैं। यह वर्षों से अंधाधुंध चल रहा है और उच्च जातियों के लोगों के हितों को आगे बढ़ा रहा है और निम्न जाति के लोगों का शोषण किया जा रहा है और उनकी चिंताओं को सुनने वाला कोई नहीं है ़झारखंड में मॉब लिंचिंग के शिकार तबरेज अंसारी की हत्या के मामले़। ़देश में थम नहीं रहे दलित लड़कियों से गैंगरेप के मामले , अभी हाल ही में Hathras जैसे घटना सामने आई । ़गुजरात : ढाबे पर दलित युवक से गिरी थाली तो कर डाली उसकी जमकर पिटाई । ़राजस्थान में: बारात के दौरान घोड़ा चढ़ने की वजह से दलित युवक की पिटाई। जयपुर मे अपराध घोषित हो जाने के बावजूद देश में छुआछूत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है , और आए दिन कहीं न कहीं से ऐसी ख़बरें आती रहती हैं , जिनमें जाति के आधार पर भेदभाव या अत्याचार की घटनाएं सामने आती हैं । एक बार फिर से घोड़ा चढ़ने की वजह से दलित युवक की पिटाई का मामला सामने आया था। ़गुजरात : दलित युवक जातिवाद एक ऐसी प्रणाली है जो उच्च जातियों के लोगों के हितों को आगे बढ़ा रहा है । निम्न जाति के लोगों का शोषण किया जा रहा है और उनकी चिंताओं को सुनने वाला कोई नहीं है।

•जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून : ़आरक्षण प्रणाली : जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून स्थापित करना एक बुद्धिमान कदम था , इसके साथ लिया गया एक और निर्णय हमारे आधुनिक समाज के लिए विनाशकारी साबित हुआ है । यह आरक्षण या कोटा प्रणाली की शुरुआत थी । कोटा प्रणाली ने शिक्षा क्षेत्र के साथ – साथ सरकारी नौकरियों में निम्न वर्ग के लोगों के लिए कुछ सीटें आरक्षित कर दीं । यह प्रणाली पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए स्थापित की गई थी । हालाँकि , यह आधुनिक भारत में एक बड़ी चिंता का कारण बन गया है । इस आरक्षण प्रणाली के कारण , कई बार सामान्य वर्ग के योग्य उम्मीदवारों को प्रवेश या रोजगार का अवसर नहीं मिलता है। •जातिवाद : वोट कमाने का एक उपकरण : राजनेता चुनाव से पहले आम जनता से वोट मांगने के लिए विभिन्न स्थानों पर जाते हैं । यह प्रचार चुनावों के महीनों पहले शुरू होता है , जिसके दौरान राजनेता जनता को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए राजी करने और प्रभावित करने के लिए अपने सभी प्रयास करते हैं । हमारे राजनेता इस बात से भली – भांति परिचित हैं कि जब उनकी जाति और धर्म की बात आती है तो वे कितने संवेदनशील होते हैं । इस प्रकार , वे इसे अधिक से अधिक वोट प्राप्त करने के लिए एक माध्यम के रूप में उपयोग करते हैं । •फेयर प्ले का अभाव : जबकि कई मतदाता अपनी जाति के आधार पर अपने नेताओं का चयन करते हैं , ये नेता समान मानदंडों के आधार पर अपने कर्मचारियों का चयन करते हैं । वे पार्टी कार्यालय में अपनी जाति से संबंधित लोगों को प्रमुख पद देना पसंद करते हैं । यह योग्य उम्मीदवारों को सबसे आगे आने और महत्वपूर्ण भूमिका निभाने से रोकता है । जो लोग प्रतिभाशाली हैं और वास्तव में समाज की भलाई के लिए काम कर सकते हैं वे इस प्रकार पीछे रह जाते हैं और गैर – योग्य लोग सत्ता में आते हैं । •विपक्षी दल जातिवाद का इस्तेमाल करते हैं : कई बार , राजनीतिक दल जातिवाद का इस्तेमाल आम जनता में नफरत फैलाने के लिए करते हैं और इस तरह अशांति पैदा करते हैं । हमारे देश में लोग धर्म और जाति के नाम पर बहुत आसानी से आहत हो जाते हैं । एक छोटा सा मुद्दा कई बार बड़े दंगों की ओर ले जाता है जो राष्ट्र की शांति में बाधा डालते हैं । यह अशांति पैदा करने का सबसे सरल तरीका है और विपक्ष को सत्ता पक्ष पर सवाल उठाने का मौका देता है । जातिवाद धार्मिक और सामाजिक जीवन को दर्शाता है भारत में जातिवाद ने भारत में लोगों के धार्मिक और सामाजिक जीवन को विशेष रूप से निर्धारित किया है , विशेष रूप से हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को । सदियों से, भारतीय गांवों में रहने वाले लोगों को उनकी जाति के आधार पर अलग किया गया है । वे विभिन्न उपनिवेशों में रहते हैं और उनकी जाति के आधार पर व्यवहार किया जाता है । पहले के समय में , विभिन्न जातियों के लोग पानी लाने के लिए अलग – अलग कुओं में जाते थे और विभिन्न स्थानों से भोजन खरीदते थे । एक ब्राह्मण ने कभी भी निचली जाति के व्यक्ति से भोजन नहीं लिया था । •लोग खुद पैदा करते हैं भेदभाव : हिंसा की ज़िम्मेदारी सरकार क्यों नहीं लेती ? इस सवाल पर बीजेपी सांसद ने कहा कि यह सिर्फ सामाजिक सोच है लोग भेदभाव खुद से पैदा करते हैं जाति मिटाओ अभियान शुरू होने चाहिए , अभी तो बस छिटपुट अभियान होते हैं उन्होंने कहा कि जब तक सवर्ण इस मुहिम में योगदान नहीं करेंगे , तब तक ऊंच – नीच का भेद नहीं ख़त्म होगा । चर्चा में शामिल रहे स्वतंत्र लेखक सुनील वर्मा ने कहा कि जातिगत भेदभाव को ख़त्म करने के लिए सरकार कड़ा एक्शन नहीं ले पा रही है अगर सरकार कुछ ऐसी मुहिम चलाए तो इन्हें रोका जा सकता है इस मुद्दे पर बदलाव के लिए राजनीति भूमिका के सवाल पर बीजेपी सांसद ने कहा कि सभी राजनीतिक पार्टियों को कभी न कभी इस पर सोचना पड़ेगा , सरकार को हस्तक्षेप करना होगा , रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़ना होगा , जिसका कभी प्रयास नहीं हुआ । न भ्रष्टाचार खतरा हैं न अत्याचार खतरा है ऊंच – नीच , भेदभाव ने भारत का ‘ पर ‘ कतरा है न कोई हिन्दू खतरा है न मुस्लमान खतरा है हज़ारों साल गुलामी के फिर भी जाति का कचरा है न चीन ही खतरा है न पाकिस्तान खतरा है फ़िज़ा में जाति ज़हर है जो इस हिंदुस्तान पर खतरा है न नक्सलवाद खतरा है न आतंकवाद खतरा है इस पावन मातृभूमि पर जातिवाद ही खतरा है । आधुनिक भारत में जातिवाद पूरी तरह से खत्म हो जाना चाहिए अगर हम वास्तव में हमारे देश को विकसित और समृद्ध देखना चाहते हैं।

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