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लोकतंत्र का ‘चौथा स्तम्भ’ : “मीडिया”

Ritu Rani

ByRitu Rani

Nov 6, 2020

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लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ “लोगों का शासन होता है” । संस्कृत में ‘लोक’ शब्द का अर्थ “जनता” और ‘तंत्र’ शब्द का अर्थ “शासन” होता है । लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है , जिसके अंतर्गत जनता अपनी मर्जी से चुनाव में आए हुए किसी भी दल को वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है , तथा उसकी सत्ता बना सकती है । लोकतंत्र को लोकतंत्र के तीन स्तंभ से संतुलित किया गया है , कार्यपालिका ( Executive ) , विधायिका ( Legislative ) , न्यायपालिका ( Judiciary ) लेकिन इस अत्याधुनिक युग में लोकतंत्र चौथे स्तम्भ की तरफ पंक्तिबद्ध है , जिसे मीडिया ( Media ) के नाम से जानते हैं ।

उत्पत्ति

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में ‘मीडिया’ शब्द की उत्पत्ति “थॉमस कार्लाईल” ( Thomas Caryle ) ने किया , जिसका जिम्मेदार ‘एडमंड बर्क’ को ठहराया । जिन्होंने 1787 में ‘ग्रेट ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स’ की प्रेस रिपोर्टिंग के उद्घाटन के दौरान संसदीय बहस में इसका इस्तेमाल किया था । ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने 1823 में ‘लॉर्ड ब्रूमम’ को चौथी खंभा शब्द का श्रेय दिया । अन्य ने इसे अंग्रेजी निबंधकार ‘विलियम हैज़लिट’ को जिम्मेदार ठहराया । आधुनिक उपयोग में , इस शब्द को थॉमस कार्लाईल द्वारा अपनी पुस्तक ‘ऑन हीरोज और हीरो वरशिप’ में वर्णित इस अर्थ में सबसे पहले उपयोग के साथ प्रेस पर लागू किया गया है : “थॉमस बर्क ने कहा कि संसद में तीन एस्टेट थे , लेकिन रिपोर्टर्स गैलरी में , एक चौथाई खंभा उन सभी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था

“Democratic system is that it gives freedom of expression and a space is given to each individual”.

जहां तक मीडिया की बात है , मीडिया दुनिया को सामाजिक ( Social ) , राजनीतिक ( Political ) और आर्थिक ( Economic) गतिविधियों के बारे में अवगत कराती है । मीडिया विश्व के लिए एक दर्पण की तरह है , जो दुनिया की सच और कठोर वास्तविकता को दर्शाती है जिसकी वजह से मीडिया पर भरोसा हर कोई करता आ रहा है और हर व्यक्ति वास्तविक और न्यायपूर्ण खबर का विश्वास करता है । हर खबर से सम्बन्धित मीडिया की अपनी राय होती है , लेकिन मीडिया इस तरह से संपादकीय प्रकाशित करती है जहां जनता मूल्यांकन कर सकती है ।

मीडिया का मुख्य उद्देश्य हर तरह के यथार्थ खबर को लोगों के सामने रखना होता है , लेकिन मीडिया कभी – कभी सच्चाई पूरी तरह से जनता को नहीं दिखाती है । जिससे जनता आधी – अधूरी खबर का शिकार बनती है और आखिर में लोकतंत्र को नुकसान होता है । मीडिया ऐसे कार्यों में शामिल हो जाती है जहां वे खबरों के स्थानांतरण ( Transfer ) का अनुबंध ( Contract ) करती है मीडिया तथा नॉन मीडिया कंपनी के बीच , जिसका नतीजा वेश परिवर्तित खबर दिखाया जाता है । जिसका प्रचलन आज के दौर में काफी देखा जा रहा है । जिसे पेड न्यूज सिंड्रोम ( Paid news syndrome ) कहा जा सकता है ।

मीडिया की दुनिया में भारत सबसे बड़ा बाजार है और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में पूरे भारत में 82237 अख़बार और अलग – अलग भाषा में 900 से भी ज्यादा टेलीविज़न चैनल चल रही है और ये संख्या दिन-पे-दिन बढ़ते जा रही है । इन सब के बावजूद , सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक , ट्विटर , इंस्टाग्राम , व्हाटसएप , इत्यादि ना जाने कितने प्लेटफार्म हैं जो मनोरंजन ( Entertainment ) , राजनीतिक ( Politics ) और कॉरपोरेट विज्ञापन ( Corporate Advertisement ) की ओर अपना मुख मोढ़ने को इच्छुक है ।

जवाबदेह मीडिया ( Accountable Media ) और बेहिसाब मीडिया ( Unaccountable Media ) को दो तरफा हथियार समझा जा सकता है , जहां एक तरफ मीडिया राष्ट्र को मजबूत सहयोग देकर ऊंचाई तक पहुंचाने में मददगार साबित हो सकता है और वहीं दूसरी तरफ विनाश का कारण भी बन सकती है।

संविधान और मीडिया :

मीडिया के द्वारा और मीडिया से जनता अधिकतर प्रभावित होती है । सरकार बनाने और सरकार ना बनाने में मीडिया अहम भूमिका निभाती है , तो यह कहने में बिलकुल गलत नहीं होगा कि सरकार बनाने में मीडिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है और यह समाज को प्रभावित करती है । मीडिया कई कानून और विनियम ( Law and Regulations ) के द्वारा नियंत्रित किया जाता है ।

नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय नियम ( International Covenant On Civil And Political Rights ) का अनुच्छेद 19 कहता है – “भारतीय संविधान के सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है”। प्रत्येक व्यक्ति को विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है । इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिए से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण , ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित है ।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 ( ए ) मीडिया को सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान करता है , जिसमें कहा गया है कि , ” सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है । संविधान का अनुच्छेद 19 ( ए ) को अनुच्छेद 19 ( 2 ) से जोड़ते हुए कुछ प्रतिबंध लगाया गया है । अनुच्छेद 19 ( 1 ) जहां मौलिक अधिकारों की बात करता है , वहीं अनुच्छेद 19 ( 2 ) के तहत इन अधिकारों को सीमित भी किया गया है । भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी भी तरह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए”। इन तीन चीजों के संरक्षण के लिए अगर कोई कानून है या बन रहा है , तो उसमें भी बाधा नहीं आनी चाहिए ।

मीडिया को सही तरीके से चलाने के लिए बहुत सारे कानून शामिल है और स्वतंत्रता के पहले जो भी मीडिया के नकारात्मक प्रभाव थे , उसे नियंत्रण कर अनेक कानून के बारे में उल्लेख किया गया है –

  1. प्रेस अधिनियम 1799 ( The press regulation act , 1799 ) – इस अधिनियम के तहत नाम , छापने वाला ( Printer ) , संपादक ( Editor ) और प्रकाशक ( Publisher ) का पता ( Address ) अखबार के लिए होना अनिवार्य है ।
  2. गैगिंग एक्ट , 1857 ( The gagging act , 1857 ) – यह अधिनियम सरकार को शक्ति देती है कि किसी भी प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा सकती है , अगर उसकी प्रवृत्ति सरकार की आलोचना करना है ।
  3. देशी प्रेस अधिनियम , 1878 ( The Vernacular Press Act , 1878 ) – यह अधिनियम अखबार से सम्बन्धित नियंत्रण के लिए ब्रिटिश शक्ति देती है , जो भारतीय भाषा में छपती थी ।
  4. भारतीय प्रेस अधिनियम ,1910 ( The Indian Press Act , 1910 ) – यह अधिनियम प्रेस के मालिक के लिए अनिवार्य बनाता है जिसे सुरक्षा जमा ( Security Deposit ) प्रस्तुत करने की आवश्यकता होगी , जिसे किसी भी आपत्तिजनक मामले को छापने पर जब्त किया जा सकता है और इसने पुलिस को किसी भी आपत्तिजनक सामग्री को जब्त करने की शक्तियां भी दी हैं । भारतीय स्वतंत्रता के बाद मीडिया को स्वतंत्रता दी गई थी लेकिन उचित प्रतिबंधों के साथ संविधान और विभिन्न विधानों को द कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट एक्ट ( Contempt of court ) के रूप में प्रस्तुत किया गया था , यह न्यायाधीशों और उनके निर्णयों के सम्मान को बनाए रखने के लिए पेश किया गया था।
  5. अल्पवय व्यक्ति अपहानिकर एक्ट , 1956 [ The Young persons’ ( Harmful Publication ) , 1956 ] – इस अधिनियम के अनुसार , साहित्य से सम्बन्धित प्रकाशन पर प्रतिबंधित लगाया , जो युवा पाठकों को प्रभावित करेगी ।
  6. केबल टेलीविज़न अधिनियम , 1955 ( The Cable Television Regulation Act , 1955 ) – इस अधिनियम के तहत केबल के द्वारा दूरदर्शन चैनल को संचारित करने के लिए सभी केबल ऑपरेटर का पंजीकरण होना अनिवार्य है ।
  7. भारतीय प्रेस परिषद् , 1965 ( Press Council Of India Act ,1965 ) – यह एक वैधानिक अंग ( Statutory Body ) है , जो मुख्य रूप से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के कामकाज को चलाने के लिए नियंत्रित करता है ।

मीडिया , अपराध और समाज

किसी भी राजनीतिक पार्टी और बड़े संस्थानों के द्वारा मूल्य देकर मीडिया को उसके असली उद्देश्य से विचलित किया जा सकता है और मीडिया पूरे विश्व के लिए दर्पण की तरह रहा है , जिसने सच और झूठ जो भी दिखाया , समाज ने उसी को सच मान लिया । यह कहते हुए बिलकुल गलत नहीं होगी की मीडिया सत्ता के हाथों की कठपुतली बन गई है । मीडिया प्रयोजक ( Sponser ) बन कर लोगों के लिए , लोगों के द्वारा और लोगों के प्रयोजक के लिए , प्रयोजक के द्वारा और प्रयोजक के लिए काम कर रहा है । कभी – कभी मीडिया , मीडिया ट्रायल के लिए ऐसे मुद्दों को उत्पन्न करती है , जहां पर न्यायालय में निर्णय देने से पहले ही मीडिया किसी को भी दोषी साबित कर देती है । आमतौर पर असली वजह और परिस्थिति को जाने बिना मीडिया समाज में हुए अपराध को अपने शब्दों में वर्णित कर देती है ।

ऐसे बहुत सारे घटना देखने के लिए मिल जायेंगे , जहां कोर्ट के द्वारा अपराधी ना होने के बावजूद भी उसे मीडिया ट्रायल में अपराधी साबित कर दिया गया । शीना बोहरा मर्डर केस ( Sheena Bohra Murder Case ) में , मीडिया की नजरों ने मुख्य आरोपी इंदिरानी मुखर्जी के निजी जीवन को छेड़ा है , जो मीडिया द्वारा पूरी तरह से आरोपी थी । उनके व्यक्तिगत जीवन और चरित्र का हर पहलू मीडिया के माध्यम से परीक्षा के सार्वजनिक लेंस में था ।

हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं , जिनमें मीडिया ने एक आरोपी का परीक्षण किया है और सरकार द्वारा किए गए फैसले से पहले ही उनका फैसला हो चुका था । कुछ आपराधिक मामले जो अप्रयुक्त हो गए हैं , लेकिन मीडिया के हस्तक्षेप के लिए प्रियदर्शनी मट्टू केस ( Priyadarshni Mattoo Case ) , जेसिका लाल केस ( Jesica Lal Case ) , नितीश कटारा मर्डर केस ( Nitish Katara Murder Case ) और कई अन्य हैं । आरुषि तलवार मर्डर केस ( Arushi Talwar Murder Case ) के मामले में मीडिया ने फैसला दिया है कि हत्या उसके माता-पिता राजेश तलवार और नूपुर तलवार ने की है , वे दोषी नहीं थे लेकिन मीडिया ने उन्हें दोषी साबित कर दिया ।

विधि आयोग ( Law Commission ) ने अपनी 200 वीं रिपोर्ट में मीडिया द्वारा ट्रायल : फ्री स्पीच बनाम फेयर ट्रायल अंडर क्रिमिनल प्रोसीजर ( कोर्ट ऑफ कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट , 1971 ) में आरोपी के अधिकारों के बारे में किसी भी तरह की पूर्वाभास की रिपोर्टिंग से मीडिया को कानून बनाने की सिफारिश की । अपराधिक कार्यवाही में जांच और परीक्षण के लिए गिरफ्तारी का समय की भी सिफारिश की ।

नवंबर 2006 को , भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वाई के सभरवाल ( Y K Sabharwal ) ने मीडिया परीक्षणों पर अपने विचार व्यक्त किए : कानून के अनुसार , एक अभियुक्त ( Accused ) को अदालत में दोषी साबित ना होने तक निर्दोष माना जाता है , और वह निष्पक्ष सुनवाई का हकदार है । तो, यह मांग करना वैध है कि किसी को किसी के पक्ष में पक्षपात या पक्षपात की अनुमति नहीं दी जा सकती है ? जनता की राय से न्यायाधीशों को क्यों बहाना चाहिए ?

20 वीं शताब्दी में जहां एक प्रसिद्ध हस्ती फैटी अर्बुवक्ले ( Fatty Arbuvckle ) को मीडिया ट्रायल द्वारा दोषी साबित किया गया था , लेकिन माननीय न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया था , लेकिन मीडिया ट्रायल के कारण उनका पूरा करियर और सभी लोग गलत मीडिया कवरेज के कारण उनकी प्रतिष्ठा के खिलाफ चले गए थे ।

प्रेस की स्वतंत्रता हमेशा सभी लोकतांत्रिक देशों में एक पोषित अधिकार रही है और प्रेस को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में वर्णित किया गया है । मीडिया को तब तक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जा सकता है , जब तक कि पारदर्शिता नहीं होगी और इस युग में मीडिया को दैनिक आवश्यकता माना जाता है क्योंकि दिन की शुरुआत मीडिया से होती है और उसी के साथ समाप्त होती है चाहे वो सोशल मीडिया हो या प्रिंट मीडिया या इलेकट्रोनिक मीडिया ।

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