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मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार): अन्यायपूर्ण व्यवहार

Ritu Rani

ByRitu Rani

Oct 24, 2020

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boy standing in front of lamp

मैरिटल रेप, जो अब भी भारत में विद्यमान है । मैरिटल रेप एक ऐसा मुद्दा है, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता है । मैरिटल रेप होता क्या है ? अगर पति अपनी पत्नी की मर्ज़ी के बगैर उससे जबरन शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे मैरिटल रेप कहते हैं । भारत में ‘वैवाहिक बलात्कार’ यानी ‘मैरिटल रेप’ कानून की नज़र में अपराध नहीं है । मैरिटल रेप आत्मपीड़न का सबसे अप्रिय तरीका है , जो अब भी हमारे समाज में मौजूद है और जिसे शादी की संस्था द्वारा परिरक्षित किया गया है ।

“Rape is defined as the unlawful carnal knowledge of a woman by a man forcibly and against her will.”

Black’s law dictionary

भारतीय दण्ड संहिता ‘धारा 375’ के तहत रेप को अपराध माना गया है । लेकिन कानून में कहीं भी ‘मैरिटल रेप’ के बारे में कोई भी उल्लेख नहीं है । भारतीय दण्ड संहिता का ‘धारा 375’ कहता है कि अपनी पत्नी के साथ सम्भोग के लिए किसी महिला की उम्र 15 साल से कम हो , तो रेप की श्रेणी में नहीं आता है । लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय लिया है कि किसी भी महिला की उम्र 15 – 18 के मध्य हो और उसके साथ मैरिटल रेप होता है तो उसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है ।

भारतीय दण्ड संहिता में ‘धारा 376′ में रेप के लिए सजा का प्रावधान है और भारतीय दण्ड संहिता में पत्नी से रेप करने वाले पति के लिए सजा का प्रावधान है बर्शते पत्नी 12 साल से कम की उम्र की हो । इसमें कहा गया है कि 12 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ पति अगर बलात्कार करता है तो उस पर जुर्माना या उसे दो साल तक की क़ैद या दोनों सजाएं दी जा सकती हैं । धारा 375 और धारा 376 के प्रावधानों से ये समझा जा सकता है कि शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए सहमति देने की उम्र तो 16 है लेकिन 12 साल से बड़ी उम्र की पत्नी की सहमति या असहमति का कोई मूल्य नहीं है ।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया निर्णय एक हर्षप्रद निर्णय है लेकिन अब भी ज्यादातर समस्याओं का हल नहीं हुआ है । उन महिला के अधिकारों का क्या जो नाबालिग (minor) नहीं है ? हमारा कानूनी प्रणाली यह साफ – साफ कहता है कि जब एक महिला की किसी पुरुष से शादी होती है तो उस महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को अपने पति के समक्ष समर्पण करना होता है ।

मैरिटल रेप घरेलू हिंसा (Domestic Violence) का सबसे बड़ा स्वरूप है। किसी अजनबी द्वारा दिया गया जख्म से कई गुना ज्यादा आघात पहुंचाता है मैरिटल रेप , जिसमें खुद का पति शामिल होता है । मैरिटल रेप बार – बार किया जाता है, जिसमें कोई भी लड़की खुद को बचाने के लिए कानून का सहारा भी नहीं ले सकती क्योंकि मैरिटल रेप से सम्बन्धित कोई कानून की व्याख्या है ही नहीं । यह एक क्रूर और महिला की गरिमा को शारीरिक और मानसिक रूप से चोट पहुंचाता है ।

1960 की शुरुआत तक मैरिटल रेप को ऑक्सीमोरों ( Oxymoron ) माना गया था । इसके पश्चात 1990 की शुरुआत में मैरिटल रेप को समाज के लिए खतरनाक और चिंताजनक समझा गया और इस वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण करना शुरू किया गया। भारत एक विकासशील देश होने के बावजूद, भारत का कानूनी प्रणाली महिलाओं को इन्साफ देने में कामयाब नहीं हो पाई है। भारत उन 36 देशों में से एक है , जहां मैरिटल रेप को अब तक अपराधीकरण की श्रेणी में नहीं रखा गया है । 1993 में यूएसए ने, 1963 में ऑस्ट्रेलिया ने मैरिटल रेप को अपराध माना है और उसका अपराधीकरण कर चुका है। यहां तक कि रवांडा (Rwanda) जैसे देश भी मैरिटल रेप को अपराध मानकर अपराधीकरण कर चुके हैं ।

दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा, “मैरिटल रेप को अपराध नहीं करार दिया जा सकता है और ऐसा करने से विवाह की संस्था अस्थिर हो सकती है । पतियों को सताने के लिए ये एक आसान औजार हो सकता है”।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिस्र का मानना है कि मैरिटल रेप या वैवाहिक बलात्‍कार को देश में अपराध की श्रेणी में रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ने कहा है कि – “जरूरी नहीं कि बाहर से उधार लिए विचार हर परिस्थिति में सही हों । सिर्फ इसलिए कि कुछ देशों ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित किया । मुझे नहीं लगता कि इसे भारत में भी अपराध घोषित कर देना चाहिए । गांवों में इससे कई परिवारों में पूर्ण अराजकता की स्थिति आ जाएगी । हमारा देश परिवार नाम की संस्‍था की वजह से आज तक बचा हुआ है । हमारे यहां आज भी पारिवारिक मूल्‍य होते हैं । हम आज भी पारिवारिक पृष्‍ठभूमि और दूसरे पहलुओं का सम्‍मान करते हैं”।

भारतीय दण्ड संहिता का ‘धारा 498 ए’ घरेलू हिंसा से सम्बन्धित है , जिसमें शारीरिक उत्पीड़न और मानसिक उत्पीड़न शामिल है लेकिन मैरिटल रेप जैसे अपघर्षक (Abrasive) रूप को शामिल नहीं किया गया है। भारतीय कानून प्रणाली नागरिकों को इन्साफ दिलाने में विफल रहा है। यदि एक महिला भारतीय दण्ड संहिता का ‘धारा 498 ए’ के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआइआर (F.I.R) दर्ज़ कराती है , तो पुलिस महिला को आत्मगवाही (Soul testimony) देने पर कोई सवाल नहीं पूछ सकता है ।

ये विशेष कानून बनाने से महिला का एक शक्तिशाली रूप सामने आ पाएगा , जिससे वर्तमान समय में मैरिटल रेप जैसे जघन्य दुर्व्यवहार को कम करने में कारगार साबित होगी । दूसरी तरफ , भारतीय कानून प्रणाली देश की महिला को मैरिटल रेप से सुरक्षित रखने के लिए एक सरल कानून प्रदान करने में असफल रहा है । मैरिटल रेप को अपराध के श्रेणी में ना रखने का सबसे बड़ा कारण यह भी है कि अपराधीकरण से विवाह की पवित्रता नष्ट हो जायेगी । मैरिटल रेप को अपराधीकरण करने से ज्यादा महत्वपूर्ण एक शादी को बनाए रखने में है , एक शादी की पवित्रता को बनाए रखने में है । यह प्रत्यक्ष रूप से सामने है कि भारतीय कानून प्रणाली में कुछ हद तक सुधार की आवश्यकता है और मजबूत कानून बनाने की आवश्यकता है , जब सरकार का लक्ष्य नागरिकों को जघन्य अपराध से सुरक्षित करने से ज्यादा शादी और परिवार को बचाना होता है ।

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