• Wed. Nov 25th, 2020

Campus Beat

Independent Student News Organization

इस्लामिक आतंकवाद और हमारी मानसिक शिथिलता

Suyash Varma

BySuyash Varma

Nov 4, 2020

Disclaimer: The views and opinions expressed in this article are those of the authors and do not necessarily reflect the views of Campus Beat. Any issues, including, offense and copyright infringment, can be directly taken up with the author.

असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा पार कर चुके हैं हम। सभ्यता के बोझ तले, सामाजिक शिष्टाचार का लबादा ओढ़े, हम प्राय: सत्य को अनदेखा कर देते हैं। यह एक बार की चीज़ नहीं है, हमारा व्यवहार है, हमारे अस्तित्व का हिस्सा बन चुका है। फ्रांस और ऑस्ट्रिया में हुए आतंकी हमले एक तरह की चेतावनी हैं – इस्लामिक आतंकवाद दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों की पुस्तकों से निकल कर भौतिक रूप ले चुका है। अधिकतर इस्लामिक राष्ट्र या तो आर्थिक रूप से कमजोर हैं या फिर विकास की दृष्टि से पिछड़े और इसका एक ही कारण है: इस्लामिक कट्टरपंथी विचारधाराओं का प्रजनन। पर हमारे संस्कारित बुद्धिजीवी वर्ग इन ‘गतिविधिओं’ को ‘इस्लामिक आतंकवाद’ कहना उचित नहीं समझते।

इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने 2014 में फ़तवा ज़ारी किया की विश्व की सभी मुस्लिमों का धार्मिक दायित्व है की वो ISIS का हिस्सा बने। 2015 में उस फ़तवे में एक संशोधन किया गया – जो मुसलमान ISIS में शामिल नहीं हो रहे, उनका ये नैतिक कर्त्तव्य बनता है की जिस शहर में वो रहते हैं वहां आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दें।

बुद्धिजीवी वर्ग भले ही इस फतवे को अनदेखा कर यह कह दें की आतंकवाद को धार्मिक रूप देना गलत है और ISIS के फतवे का महत्व मुस्लिम समाज में नहीं है, लेकिन आँकड़े कुछ और ही दर्शाते हैं।

2014 के बाद यूरोप में इस्लामी आतंकवादी घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है । वर्ष 2014-16 में यूरोप में इस्लामिक आतंकवादी हमलों से अधिक लोग मारे गए, जो कि पिछले सभी वर्षों की तुलना में संयुक्त रूप से अधिक थे। कई जगहों पर इन आतंकवादी घटनाओ में ऐसे लोग शामिल थे जिन्होंने यूरोपीय प्रवासी संकट (Europe Migrant Crisis) के दौरान शरण चाहने वालों के रूप में यूरोप में प्रवेश किया था – अधिकतर मुस्लिम शरणार्थी।

गौरतलब है की यूरोप में पहले इस्लामी आतंकवादी हमले समूहों द्वारा किए जाते थे और बम का इस्तेमाल होता था, 2014 के बाद से अधिकांश हमले बंदूक, चाकू और वाहनों का उपयोग करने वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं – जिसे हम अक्सर Lone Wolf Attack भी कहते हैं । इस से प्रतीत होता है की ISIS के फ़तवे ने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी।

विश्व के सभी वर्गों को ये समझने की ज़रूरत है की राष्ट्रवाद सीखाने की चीज़ नहीं , दिखाने की चीज़ है।

सत्य से मुख मोड़ने वाले इतिहास की कालजयी पन्नो पर कायरों के रूप में अंकित होते हैं। इस्लामिक आतंकवाद हमारी वास्तविकता है और इस से सही तरीके से निपटने की आवश्यकता है।

कभी कभी बड़े बड़े पत्रकार, प्रोफेसर, समाजसेवी, और विचारक को सुनता हूँ तो चिंतन में पड़ जाता हूँ की क्यों देश का एक बड़ा तबका आतंकवाद के खिलाफ एकजुट नहीं हो पा रहा? क्यों हर वक़्त एक वैकल्पिक वास्तविकता के तले इतने बड़े सच को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है? क्यों अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के नाम पर सुरक्षा का गला घोंट दिया जाता है? क्यों ‘भगवा आतंकवाद’ पर हल्ला बोलने वाले लोग ‘इस्लामिक आतंकवाद’ पर चुप्पी साध लेते हैं? क्यों युवाओं का एक भी समूह इस आतंकवाद के खिलाफ आगे नहीं आता।

इस देश के युवाओं एवं तथाकथिक बुद्धिजीवियों का दुर्भाग्य ये है की उन्हें सबकुछ फेसबुक और व्हाट्सप्प के माध्यम से समझना है।

सरल एवं त्वरित टिपण्णी उनके ज्ञान का जरिया बन गयी है। हम में से कोई भी अपने दिल पर हाथ रहकर ये नहीं कह सकता की मेरे पास जितने रुपए का मोबाइल है उतने की पुस्तके भी हैं। मोबाइल इंटरनेट की आदत का सीधा प्रभाव हमारे राजनीतिक निष्क्रियता पर पड़ता है – वैकल्पिक सिद्धांतो का प्रचलन है और इस्लामिक आतंकवादियों के धनार्जन श्रोत भी कम नहीं है, इसलिए फेसबुक और व्हाट्सप्प जैसे लोकप्रिय माध्यमों पर आप अक्सर ‘Don’t Attach Religion to Terrorism’ जैसी बेहूदी बातों से रूबरू होंगे। जिनकी बौद्धिक क्षमता इन लोकप्रिय माध्यमों तक सीमित है और जिनका वास्तविकता से कोई परिचय नहीं है, वो अक्सर ऐसी बातों को सच मान लेते हैं।

इस्लामिक आतंकवाद से निपटारा सिर्फ युद्ध रणनीति से नहीं होने वाला, विचारधारा परिवर्तन की आवश्यकता है। भारतीय मुस्लिम समाज का वो तबका जो शिक्षित है और धर्मांध नहीं है, उनकी जिम्मेदारी है की वो सामाजिक जागरूकता फ़ैलाये। राजनेता, अभिनेता और सेलेब्रिटी जिनके लाखों अनुयायी हैं, उनका कर्त्तव्य है की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के नाम पर राष्ट्रहित से न खेले और अल्पसंख़्यकों को नौकरी और शिक्षा देकर मुख्यधारा से जोड़े। राष्ट्रीय एकता सिर्फ भारतीयों की एकता से ही सुदृढ़ रह सकती है।

Featured Image: Look Act

Comments