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जगदीश चंद्र बसु के अनसुने किस्से।

Shivi Gupta

ByShivi Gupta

Oct 2, 2020

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परिचय जगदीश का जन्म 30 नवंबर 1858 में तत्कालीन बंगाल के मेमनसिंह नगर के पास स्थित ररौली गांव में हुआ था। यह इलाका अब बांग्लादेश में है। 23 नवंबर 1937, गिरीडीह में उन्होंने अंतिम सांस ली। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही स्थित एक विद्यालय से प्राप्त की। इनके पिता भगवान चंद्र बसु एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, लेकिन जगदीश ने कभी भी उनकी पहचान का फायदा नहीं उठाया और अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। डॉ॰ जगदीश चन्द्र बसु भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था। वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में उन्होनें कई महत्त्वपूर्ण खोजें की। साथ ही वे भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता थे।

लंदन से वापस आने के बाद 1985 में बसु कलकत्ता के प्रसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम करने लगे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेजों की तुलना में काफी कम वेतन दिया जाता था। जगदीश चंद्र ने इसका विरोध किया और तीन वर्ष तक बिना कोई वेतन लिए काम करते रहे। वेतन न लेने की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। उन पर कर्ज भी हो गया था, जिसे चुकाने के लिए उन्हें अपनी पैतृक जमीन तक बेचनी पड़ी थी। आखिरकार बसु की ज़िद के आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। तब सरकार ने उनकी नियुक्ति की तारीख से लेकर पूरा वेतन उन्हें दिया।

जगदीश बसु ने कई विदेशी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई की, इस दौरान उन्होंने कई देशों में काम भी किया लेकिन वो भारत के निवासी होने की पहचान पर गर्व करते थे। उन्होंने कभी भी अपनी पहचान छुपाने की कोशिश नहीं की। उन दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि अच्छी नहीं समझी जाती थी। भारत को एक पिछड़ा हुआ देश माना जाता था लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी असल पहचान को स्वीकारा।अध्ययन अपने प्रयोगों से उन्होंने साबित कर दिया कि पेड़-पौधों में भी जान होती है और वे भी सांस लेते हैं। पौधों की वृद्धि को मापने के लिए बोस ने एक अत्यन्त संवेदी यंत्र बनाया। उन्होंने इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ नाम दिया। बसु ने दर्शाया कि पौधों में भी हमारी तरह ही दर्द का एहसास होता है। प्रोफेसर बोस की वैज्ञानिक खोजों साथ एक विवाद भी जुड़ा है। रेडियो के आविष्कार का श्रेय हमेशा से इटली के वैज्ञानिक ‘जी. मार्कोनी’ को दिया जाता है। मार्कोनी को इस खोज के लिए 1909 का फिज़िक्स का नोबेल पुरस्कार भी मिला। मगर हमेशा से कहा जाता है रेडियो की खोज प्रोफेसर बोस ने मार्कोनी से पहले ही कर ली थी। मगर ब्रिटिश उपनिवेश का नागरिक होने के कारण उन्हें इसका श्रेय नहीं दिया गया।

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