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जनाजे पर मेरे लिख देना यारों, मोहब्बत करने वाला जा रहा है: राहत इंदौरी

Vasundhara Vatham

ByVasundhara

Oct 15, 2020

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राहत कुरेशी….. लेकिन शेरो शायरी में मुकाम मिलने के बाद बने राहत इंदौरी। हर नौजवान की जुबां पर रहने वाली गजलों का नाम ही है राहत इंदौरी।
रहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 में इंदौर में हुआ, उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर से की। इस्लामिया करीमिया कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और फिर उर्दू साहित्य में एम्ए और पीएचडी की। 19 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में एक दिल को छू देने वाली शायरी सुनाई जिसके बाद उन्हें देश विदेश से मुशायरे के न्यौते आने लगे जिसके बाद उन्हें देश विदेश में मशहूर शायर राहत इंदौरी के नाम से पहचान मिली। उनकी मशहूर शायरी हर हिंदुस्तान की हिंदुस्तानी के जुबान पर छा गई।
“अगर खिलाफ है होने दो जाना थोड़ी है
यह सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में
यहां पर सिर्फ मकान थोड़ी है,
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं, जाती मकान थोड़ी है,
सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है”
प्रोफेसर वसीम बताते है की राहत साहब अपने अंदाज़ के शायर रहे है। उन्हें तीखे लहजे वाला शायर कहना भी सही होगा, अपने मन की बात को उन्होंने कभी छुपाया नहीं जो सही लगा वह कहा नफा नुकसान के बारे में कभी नहीं सोचा। इतने लंबे अरसे तक शिखर पर रहना बड़ा मुश्किल होता है मगर उनकी शोहरत में कभी भी गिरावट नहीं आई।
राहत साहब को उर्दू मुख्य शायर नामक उनकी थिसिस के लिए उन्हें सम्मानित भी किया गया। राहत इंदौरी साहब को पेंटिंग में भी शोहरत प्राप्त हुई परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण वह 10 वर्ष की आयु में साइन पेंटिंग करने लगे थे। 50 साल पहले उनकी पेंटिंग की दुकान थी और साइन बोर्ड पेंटिंग उनकी जीविका का साधन थी। एक दौर था जब लोग उनकी पेंटिंग के लिए महीनों इंतजार किया करते थे उनकी बनाई पेंटिंग देश-विदेश में देखने को मिल जाएगी। राहत साहब ने फिल्मों के बैनर भी चित्रित किए यही नहीं वह पुस्तकों के कवर भी डिजाइन करते थे।
“दो गज सही मगर यह मेरी मिल्कियत तो है, ऐ मौत तूने मुझे जमीदार कर दिया”
जैसी गजलों पर अपना नाम लिखकर, अपनी कुछ स्म्रतियों को छोड़ कर 11 अगस्त 2020 को उन्होंने इस दुनिया से रुखसत ले ली।

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