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क्या छात्रों के लिए मेंटल हेल्थ एक अहम मुद्दा है?

woman sitting on black chair in front of glass-panel window with white curtains

पिछले कुछ समय या सालों की बात करें तो मेंटल हेल्थ जिसे मानसिक स्वास्थ्य कहते हैं, को अलग ही नज़रिए से देखा जाता था। जैसे- पहले ज्यादातर लोगों द्वारा यह माना जाता था कि जो व्यक्ति मनोचिकित्सक के पास जाता है वह पागल या मानसिक रूप से ग्रस्त होता है। लेकिन आज स्थिति बदल गई है। लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो रहे हैं। वे लोग जो खुद को तनाव, अत्याधिक अकेलापन, दुखी, परेशान व असंतुष्ट पाते है, वह अब मनोचिकित्सक के पास जाने लगे हैं।


मानसिक स्वास्थ्य आखिर है क्या?


मानसिक स्वास्थ्य को पूर्णरूपेण शारिरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के रूप में परिभाषित करना ज्यादा उचित होगा। मानसिक स्वास्थ्य का आशय भावानात्मक, मानसिक तथा सामाजिक सम्पन्नता से लिया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य का मानव के जीवन पर गहरा असर होता है। यह उसके सोचने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है।

आज हर व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रोगों का शिकार है। जिसमे सबसे अधिक बच्चे हैं, फिर यह बच्चे चाहे स्कूली हों या कॉलेज जाने वाले, सभी छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य की कमजोरी है। छात्रों में मानसिक बीमारियों के लक्षण जैसे उदास या मायूस रहना, दोस्तों, परिवार आदि से अलग रहना, असामान्य बर्ताव करना, घबराहट या डर लगना, आत्महत्या का विचार मन में आना या गुस्सा अधिक आना आदि लक्षण हैं। इन्हीं सब मुद्दों के मद्देनजर ही स्कूली पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करने से छात्रों के कल्याण पर काफी प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे स्कूल जो लगातार अपने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और उनके कल्याण के लिए जागरूक प्रयास करता है, वह जीवन जीने और सीखने के लिए एक स्वस्थ व्यवस्था और अपनी क्षमता को मजबूत करता है। अतः हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम छात्रों के तनाव को जितना हो सकते उतना कम करें, उन्हें अच्छी नींद मिले, अछ्या पौष्टिक आहार मिलने आदि।


विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार

  • 15-29 से उम्र के बीच के व्यक्ति तनाव के कारण आमहत्या कर लेते हैं।
  • 1000 लोगों में से लगभग 33 प्रतिशत लोग तनाव और चिंता के शिकार है।
  • भारत की 7.5 फीसदी आबादी किसी न किसी प्रकार की ममसिक समस्या से जुझ रही है।
  • 450 मिलियन लोग वैश्विक स्तर पर मानसिक विकार से पीड़ित हैं।

जब मानसिक स्वास्थ्य की बात आती है तो पिछले साल 2020 में बॉलीवुड एक्टर सुशांत्र सिंह राजपूत आत्महत्या का केस सबसे चर्चित विषय है। लेकिन जब से कोरोना महामारी के कारण लॉकगउन हुआ तब से अब तक तनाव, कुठा, आत्महत्या जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं बढ़ी है। कोरोना संक्रमण काल के दौरान आत्महत्या की दर तीस प्रतिशत तक बढ़ी है। विशेषकर महिलाओं और किशोरियों में यह आँकड़ 50% तक पहुँच गया हो । भारतीया जनगणना एवं राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो(NCB) के अनुसार वर्ष 2019 में प्रतिदिन औसतन 381 आत्महत्या के आंकड़े सामने आए और 2020 तक इन आंकड़ों में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कोरोना काल में TV पर कोरोना से संबंधित खबरें देखने व अखबारों में खबरे आर्टिकल पढ़ने से भी लोगों का मानसिक बिगड़ा है “यही कारण है कि विश्व स्वास्थ संगठन समेत कई प्रमाणित स्वास्थ्य संगठनों ने यह सिफारिश की है कि लोग तनाव और बैचैनी का सबब बनने वाली फर्जी जानकारियों से बचने के लिए विश्वसनीय स्वास्थ्य पेशेवरों से ही जानकारी और सलाह लें।”

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