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पैतृक सम्पत्ति में ‘बेटियों का अधिकार’

Ritu Rani

ByRitu Rani

Oct 19, 2020

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भारत में महिलाओं के भूमि तथा संपत्ति पर अधिकार , केवल वैधानिक अवमानना के उलझे सवाल भर नहीं हैं बल्कि उसका मूल, उस सामाजिक जड़ता में है जिसे आज आधुनिक भारत में नैतिकता के आधार पर चुनौती दिया ही जाना चाहिये । भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में से है जहाँ संवैधानिक प्रतिबद्धता और वैधानिक प्रावधानों के बावजूद महिलाओं की आधी आबादी आज भी अपनी जड़ों की तलाश में है । पैतृक संपत्तियों में महिलाओं के अधिकार से है कि बेटियों को भी पैतृक सम्पत्ति में उतना ही अधिकार मिलेगा जितना बेटों का होता है । महिलाओं के संपति पर अधिकार से सम्बन्धित 11 अगस्त 2020 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिंदू उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम , 2005 की पुनर्व्याख्या करते हुये ये फैसला सुनाया कि भले ही पिता की मृत्यु 2005 के संशोधन से पहले हुई हो , तब भी जन्म से ही उनकी बेटियों का पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार होगा ।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 ( Hindu Succession Act , 1956 )

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 के तहत ये प्रावधान थे कि कानूनी उत्तराधिकार के रूप में केवल पुरुषों को ही मान्यता मिली थी । हिंदू कानून की मिताक्षरा धारा को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 के रूप में संहिताबद्ध किया गया , संपत्ति के उत्तराधिकार को इसी अधिनियम के तहत प्रबंधित किया गया । ये उन सभी पर लागू किया गया जो बौद्ध , सिख , जैन और आर्य समाज , ब्रह्म समाज के अनुयायी है । जो धर्म से मुस्लिम , ईसाई , पारसी या यहूदी नहीं हैं। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 का मुख्य आलोचक ‘धारा 6’ रहा है , जिसमें उत्तरजीविता ( Survivorship ) की बात की गई है । धारा 6 में ये बताया गया है कि सिर्फ पुरुष ही कॉपर्सेंनर होंगे और उनकी अगली तीन पीढ़ी में समान रूप से सम्पत्ति का विभाजन होगा । जिसे 2005 में संशोधित किया गया ।

हिंदू उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम , 2005 [ Hindu Succession ( Amendment ) Act , 2005 ]

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 को सितंबर 2005 में संशोधित किया गया और वर्ष 2005 से संपत्ति विभाजन के मामले में महिलाओं को कॉपर्सेंनर के रूप में मान्यता दी गई । हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 की ‘धारा 6’ में उल्लेख उत्तरजीविता ( Survivorship ) को हटा कर वसीयतनामा उत्तराधिकार ( Testamentary Succession ) और निर्वसीयत उत्तराधिकार ( Intestate Succession ) लाया गया । वसीयतनामा उत्तराधिकार के तहत कोई भी व्यक्ति इच्छा – पत्र ( Will ) के अनुसार सम्पत्ति का विभाजन किसी भी व्यक्ति के बीच कर सकता है । निर्वसीयत उत्तराधिकार के तहत कोर्ट ने 4 क्लास ( Class I – IV ) का परिचय दिया गया , जिसमें कहा गया कि पहले क्लास में जितने व्यक्ति आते हैं , उन सभी को बराबर का हक मिलेगा । ‘धारा 6′ में संशोधन करते हुए ये कहा गया कि एक कॉपर्सेंनर की पुत्री को भी जन्म से ही पुत्र के समान कॉपर्सेंनर माना जायेगा । इस संशोधन के तहत बेटियों का सम्पत्ति में समान अधिकार के साथ – साथ देनदारी ( Liabilities ) में भी बराबर की भागीदारी होगी। यह कानून पैतृक संपत्ति और व्यक्तिगत संपत्ति में उत्तराधिकार के नियम को लागू करता है , जहाँ उत्तराधिकार को कानून के अनुसार लागू किया जाता है , न कि एक इच्छा-पत्र के माध्यम से । वर्ष 2005 के संशोधन से पहले आंध्रप्रदेश , कर्नाटक , महाराष्ट्र और तमिलनाडु ने कानून में यह बदलाव कर दिया था । केरल ने वर्ष 1975 में ही हिंदू संयुक्त परिवार प्रणाली को समाप्त कर दिया था ।

पुनर्व्याख्या ( Reinterpretation ) की आवश्यकता क्यों पड़ी?

हिन्दू उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम , 2005 को कानूनी रूप से 9 सितम्बर 2005 को लागू किया गया । इस अधिनियम के अन्तर्गत महिलाओं को समान अधिकार दिया गया फिर भी कई मामलों में यह प्रश्न उठा कि क्या कानून भूतलक्षी ( Retrospective ) रूप से लागू होता है ? इसमें सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि महिलाओं के अधिकार पिता की जीवित स्थिति पर निर्भर करती थी या नहीं ? इस मुद्दे पर न्यायालय ने परस्पर विरोधी विचार रखे थे , जिसमें स्पष्टता का अभाव था । पुनर्व्यख्या की ज़रूरत क्यों पड़ी , आइए इसे 3 केस के जरिए समझते हैं ।
सबसे पहला मामला है वर्ष 2016 का , प्रकाश v. फूलवती ( Prakash v. Phulwati ) , जिसमें दो न्यायाधीशों की बेंच जस्टिस अनिल दवे ( Justice Anil Dave ) और जस्टिस एके गोयल ( Justice A. K. Goyal ) ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि पिता की मौत 9 सितंबर , 2005 को हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम के पारित होने से पहले हो गई है तो बेटी को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलेगा ।
दूसरा मामला है वर्ष 2018 का , दनम्मा v. अमर ( Danamma v. Amar ) , जिसमें दो न्यायाधीशों की बेंच जस्टिस एके सीकरी ( A. K. Sikri ) और जस्टिस अशोक भूषण ( Justice A. K. Bhushan ) ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर पिता की मौत 9 सितम्बर , 2005 के अधिनियम लागू होने से पहले हो गई हो तब भी बेटी को पिता की सम्पत्ति में अधिकार मिलेगा ।
ऐसे में इस प्रावधान को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी हुई थी और स्पष्टता का अभाव था । जिसे वर्ष 2020 में विनीता शर्मा v. राकेश शर्मा ( Vineeta Sharma v. Rakesh Sharma ) के केस में पारदर्शिता मिली । इस मामले में तीन न्यायाधीशों की बेंच जस्टिस अरुण मिश्रा ( Justice Arun Mishra ) , जस्टिस अब्दुल नजीर ( Justice Abdul Nazeer ) और जस्टिस एमआर शाह ( Justice M. R. Shah ) ने यह निर्णय लिया कि बेटियों का पैतृक सम्पत्ति पर अधिकार , बेटों के अधिकार की तरह ही जन्म से मिला है । पिता की मौत अधिनियम लागू करने से पहले हुई या बाद हुई हो , ये फर्क नहीं पड़ता ।

” A daughter always remains a loving daughter . A son is a son until he gets a wife . A daughter is a daughter throughout her life “.
– Justice Arun Mishra

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय ने मिताक्षरा विधि का अध्ययन कर यह पाया कि एक पिता के संपूर्ण जीवनकाल के दौरान परिवार के सभी सदस्य को कॉपर्सनरी का अधिकार प्राप्त होता है । सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार , एक हिंदू महिला को पैतृक संपत्ति में संयुक्त उत्तराधिकारी होने का अधिकार जन्म से प्राप्त है , यह इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि उसका पिता जीवित हैं या नहीं । सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस निर्णय में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष 2005 में किये गए संशोधनों का विस्तार किया , इन संशोधनों के माध्यम से बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार देकर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 की धारा 6 में निहित भेदभाव को दूर किया गया था । सर्वोच्च न्यायालय ने सभी उच्च न्यायालयों को छह माह के भीतर इस मामले से जुड़े मामलों को निपटाने का भी निर्देश दिया ।

क्या यह न्यायसंगत है ?

मान लीजिए किसी लड़की की शादी कम उम्र में हो जाती है और वो लड़की पूरी तरह से अपने पति पर निर्भर है और पति तथा उसका परिवार उसे प्रताड़ित करता है । ऐसे में अगर लड़की कमाने योग्य नहीं है तो उसकी जिंदगी नरक हो जाएगी । तब सहारे की उम्मीद मायके से होती है । लेकिन , अगर माता-पिता भी मदद नहीं करना चाहें और भाई पैतृक संपत्ति का एक टुकड़ा भी नहीं देना चाहे तो क्या होगा ? स्वाभाविक है तब स्थिति और दयनीय हो जाएगी । ऐसे में उस लड़की या महिला को क्या करना चाहिए ?
इसमें कोई दोराय नहीं है कि पिता , भाई , पति अथवा अन्य किसी पर भी वित्तीय निर्भरता से महिलाओं की जिंदगी कठिन हो जाती है । यही वजह है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम , 1956 में साल 2005 में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का कानूनी अधिकार दिया गया । दूसरा सबसे बड़ी वजह ये भी रही है कि अक्सर देखा गया है कि बेटियां अपने माता – पिता का ध्यान बेटों की तुलना में ज्यादा रखती है । इस अत्याधुनिक युग में मुश्किल समय में बेटियां ही माता – पिता की सहारा बनती है ।
सॉलिसिटर जनरल ने मिताक्षरा कॉपर्सनरी , 1956 कानून की आलोचना की क्योंकि यह कानून लैंगिक आधार पर भेदभाव करता है । भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार ( अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 ) के लिये दमनकारी और नकारात्मक भी है। हिन्दू उत्तराधिकार ( संशोधन ) अधिनियम , 2005 कानूनी रूप से लैंगिक असमानता को ख़त्म करने का एक बड़ा कदम साबित होगा । हमारा संविधान हर एक व्यक्ति को समानता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है , जो संशोधन 2005 के बाद महिलाओं को पुरुषों की तरह समानता का अधिकार और अवसर देता है । किसी भी पहलू का अगर सकारात्मक पक्ष है , तो उसका नकारात्मक पक्ष भी है । यह संशोधन पूरी तरह से न्यायपूर्ण है या नहीं , ये तो नजरिए की बात है ।

गाँधी जी का मानना था कि भारत जैसे देश में लोकतंत्र की बुनियादी इकाई परिवार है । महिलाओं की संपत्ति , भूमि और समानता के अधिकारों की मान्यता और उससे उपजे प्रश्नों का प्रथम समाधान वास्तव में परिवार के बुनियाद और व्यावहारिक इकाई में ही संभव है । सरकार और न्यायालय महिलाओं के अधिकारों के लिये नियम-अधिनियम तो बना और बता सकती हैं , लेकिन जैसा सर्वोच्च न्यायालय के व्याख्या के निहितार्थ ( Implication ) थे कि सामाजिक मान्यताओं का कायाकल्प ( Rejuvenation ) भी होना चाहिये तभी कानून , महिलाओं के अधिकारों को वास्तविकता में बदल पाएगा ।

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