आत्महत्या का कारण बनती बेरोज़गारी का कब होगा हल?

आत्महत्या का कारण बनती बेरोज़गारी का कब होगा हल?

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के एक जूता व्यापारी ने फेसबुक लाइव करते हुए कथित रूप से कारोबार में मंदी और आर्थिक तंगी के कारण जहर खा लिया। इसके बाद व्यक्ति की पत्नी ने भी जहर खा लिया। डी डब्ल्यू न्यूज़ के मुताबिक इलाज के दौरान पत्नी की जान चली गई और व्यक्ति की हालत अभी भी गंभीर है। सर्वाइवर व्यक्ति ने फेसबुक लाइव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अपनी मौत का ज़िम्मेदार माना। उसने फेसबुक लाइव करते हुए बयान दिया कि वह देशद्रोही नहीं है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार छोटे दुकानदार और किसानों की शुभचिंतक नहीं है। पूरे देश में नोटबंदी, जीएसटी और उसके बाद कोरोना महामारी के कारण छोटे व्यापारी, दैनिक मजदूर, दूकानदार और किसान भयानक आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।

साल 2016 में लागु हुई नोटबंदी और फिर जीएसटी ने देश में आर्थिक लेन-देन और व्यापार को पूरी तरह बदल कर रख दिया। इन सभी कारणों से सबसे ज्यादा छोटे व्यापारियों, दैनिक मजदूर, श्रमिक और निम्न आय वालों का नुकसान हुआ जिससे वे अब तक उबर नहीं पाए हैं। इस घटना ने एक बार फिर बेरोजगारी और आर्थिक तनाव झेल रहे लोगों की मौजूदा स्थिति उजागर किया है। कोरोना महामारी से पहले भी देश में बेरोजगारी एक चुनौतीपूर्ण समस्या थी। महामारी के बाद स्थिति के बदतर होने से आत्महत्या करने की प्रवृति और संख्या दोनों में बढ़ोतरी देखी गई। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2018 से 2020 के बीच बेरोजगारी या कर्ज में डूबे होने से 25 हज़ार से अधिक लोगों की आत्महत्या से मौत हुई। आज देश में लोगों का लंबे समय तक बेरोजगारी या आर्थिक मंदी झेलने के बाद आत्महत्या से मौत अपने आप में एक महामारी का रूप ले रहा है। यह मसला सुनने में भले साधारण लगे, लेकिन बेरोजगारी और उससे जुड़ा मानसिक स्वास्थ्य की समस्या एक जटिल विषय है।

बेरोजगारी की समस्या चुनावी नतीजों को प्रभावित क्यों नहीं करती  

हमारे देश में बेरोज़गारी और इसे लेकर राजनीतिक दलों का एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराने का चलन नया नहीं है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में विशेषकर कोरोना महामारी के बाद बेरोज़गारी बढ़ी है। लेकिन साफ तौर पर यह अब तक चुनाव के नतीजों को प्रभावित नहीं कर पाई है। इसके पीछे सरकार के किए गए वादे की उम्मीद, हर चुनाव के पहले कोई नई रणनीति की घोषणा हो सकती है। चूंकि हमारा देश कभी भी बेरोजगारी जैसी समस्या से पूरी तरह मुक्त नहीं रहा है, इसलिए आम तौर पर इसे पिछली सरकार की नीतियां या बाज़ार के हालत के साथ तुलनामूलक रूप से दिखाया जाता है। संभवतः इसलिए पिछले 45 वर्षों में सबसे खराब बेरोजगारी स्तर होने के बावजूद, बीजेपी सरकार ने 2019 लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की। दूसरा, बीजेपी सरकार देश में रोज़गार में बढ़ोतरी दिखाने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करती आई है।

जैसे, पिछले कुछ सालों में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में कर्मचारियों का नामांकन तेजी से बढ़ा है। द इकोनॉमिक टाइम्स में छपी खबर मुताबिक ईपीएफओ के आंकड़ों के आधार पर केंद्रीय सांख्यिकीय संस्थान (सीएसओ) दावा करती है कि साल 2018-19 में औपचारिक क्षेत्र में 13.7 मिलियन नौकरियां बढ़ी हैं। लेकिन हमारे देश में एक बड़ी आबादी अशिक्षित है और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती है जिसका कोई सरकारी लेखा-जोखा नहीं है। गौरतलब हो कि ईपीएफओ के नियमों के अनुसार हर उस कंपनी का पंजीकरण करवाना अनिवार्य है जहां 20 या उससे अधिक कर्मचारी काम कर रहे हो।

साधारणतः छोटी-छोटी पंजीकृत कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या कभी भी एक जैसी नहीं रहती। ईपीएफओ के अंतर्गत लाखों ऐसे पंजीकृत नाम भी हैं, जो तत्कालीन समय में नौकरी नहीं कर रहे। इसलिए पंजीकरण का मतलब अनिवार्य रूप से हजारों-लाखों लोगों की नौकरी नहीं हो सकती। केंद्र सरकार की स्किल इंडिया, मेड इन इंडिया या स्टैंड अप इंडिया जैसी योजनाएं मूलतः औपचारिक क्षेत्र के विशेषाधिकार प्राप्त शिक्षित वर्ग के लिए मददगार साबित हो रही है। नीति आयोग के मुताबिक कुल रोजगार करने वालों का मात्र 8 फीसद ही संगठित क्षेत्र में कार्यरत है। 90 फीसद से अधिक लोग अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। आम तौर पर जिन लोगों तक शिक्षा जैसी सुविधाएं नहीं पहुंच पाती उनके लिए रोज़गार और अधिक जरूरी हो जाता है। कमजोर विपक्ष और लड़खड़ाती मीडिया के बीच बीजेपी सरकार ने बेरोजगारी जैसे गंभीर समस्या को कभी मुद्दा बनने ही नहीं दिया। बल्कि कभी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पकोड़ा बेचने को नौकरी बताया तो कभी सालाना एक करोड़ नौकरी निर्माण करने का प्रलोभन देते रहे।

बेरोजगारी और इससे जुड़े अन्य मानदंड      

यह जरूरी है कि सरकार बेरोजगारी सुधरने की घोषणा के साथ-साथ देश में कुल वेतन पानेवाले नौकरीपेशा लोग, रोजगार दर और श्रम बल भागीदारी की भी बात करे। सही मायनों में बेरोजगारी दर के सुधरने का दावा तब संभव है, जब इन सभी मानदंडों में सुधार हो। जैसे, जनवरी 2022 में बेरोजगारी दर में गिरावट दर्ज हुई। यह दिसंबर 2021 के 7.9 फीसद से लगभग 1.3 फीसद गिरकर जनवरी में 6.6 फीसद हो गई।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के रिपोर्ट अनुसार जनवरी 2022 तक बेरोजगारों की संख्या में 6.6 मिलियन की भारी गिरावट आई। लेकिन सीएमआईई बताती है कि बेरोजगारी दर में यह गिरावट अधिक लोगों को नौकरी मिलने से नहीं हुई। बल्कि, बेरोजगार लोगों ने नौकरी की तलाश करना ही बंद कर दिया। नतीजतन, उन्हें बेरोजगार के रूप में नहीं गिना गया। वे श्रम बल से बाहर थे और इसलिए बेरोजगारी दर के माप में उनकी गिनती नहीं की गई। वहीं जनवरी में रोजगार दर दिसंबर के 37.2 से बढ़कर 37.6 फीसद रहा और श्रम बल भागीदारी दर दिसंबर 2021 के 40.9 फीसद से गिरकर जनवरी 2022 में 39.9 फीसद दर्ज हुई।

कोरोना महामारी और उससे पहले की स्थिति 

पिछले कुछ सालों में बेरोजगारी के कारण आत्महत्या की संख्या लगातार बढ़ी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर आधारित द इंडियन एक्सप्रेस की खबर अनुसार साल 2014 में केंद्र में बीजेपी सरकार के बाद साल 2020 तक हर साल बेरोजगारों में आत्महत्या से हुई मौत की संख्या औसतन 2,681 रहा। साल 2019 में यह संख्या 2851 था, 2018 में 2,741, 2017 में 2,404, 2016 में 2,298, 2015 में 2,723 और 2014 में 2,207 रहा। गौरतलब हो कि नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफार्मेशन (एनसीबीआई) मानती है कि चूंकि हमारे देश में आत्महत्या को अपराध माना जाता है, इसलिए यह अंडर रिपोर्टेड है। बात वेतन पाने वाले नौकरीपेशा लोगों की करें, तो साल 2019-20 में, सभी नौकरीपेशा लोगों में वेतन पाने वाले नौकरीपेशा लोगों की हिस्सेदारी 21.2 प्रतिशत थी। वहीं दिसंबर 2021 में इनकी हिस्सेदारी गिरकर 19 फीसद दर्ज हुई।

बीजेपी सरकार के शाषण काल में साल दर साल महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक तंगी और उससे जुड़ी मौत राष्ट्रीय मुद्दा बनने में पूरी तरह असफल रही और इस समस्या को मेनस्ट्रीम मीडिया भी गंभीरता से नहीं दिखा पाया। महामारी और लॉकडाउन की वजह से पहले से कमज़ोर अर्थव्यवस्था सुधरने के बजाय बिगड़ती नज़र आई। इसके बावजूद, इस साल के बजट में न ही मंदी से उबरने के लिए कोई विशेष योजना पेश की गई, और न ही मिडिल क्लास परिवारों के लिए टैक्स स्लैब में कोई परिवर्तन किया गया। बहरहाल, आर्थिक तंगी से जूझती आम जनता के लिए महामारी के बाद बाजार की हालत सुधरने का इंतज़ार करना ही एकमात्र उम्मीद की किरण बनी हुई है।

Originally published on Feminism in India Hindi and re-published here with permission.

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