यूपीएससी, बिहार का बेटा और खोखला अपनापन

यूपीएससी, बिहार का बेटा और खोखला अपनापन

आप सामाजिक रूप से कितने भी तिरस्कृत क्यों न हो, अगर सफलता ने आपके कदम चूम लिए हों तो वही समाज आपके सामने प्यार और सम्मान का महोत्सव खड़ा कर देगा। सफल लोगों को अपना दिखाने और अपनाने की सभ्यता सी हो गयी है हमारी। सफलता कुछ ऐसी चीज़ है कि वैसा व्यक्ति जिसने अपने जीवन का अधिकतम हिस्सा शहर के बाहर बिताया हो वो अचानक से ‘शहर का बेटा’ हो जाता है, वो लड़की जिसे हर काम समाज और दूसरों को खुश करने के लिए करना होता हो वो ‘देश की बेटी’ बन जाती है। ये सिर्फ एक परीक्षा या फिर एक पद की बात नहीं है, ये जो खोखला अपनापन है वो समाज के हर क्षेत्र में दिखता है।

अपनेपन का दिखावा

कल से सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट देख रहा हूँ कि बिहार के बेटे ने यूपीएससी में बाजी मारी। शुभम ने अपनी मेहनत और लगन से यूपीएससी की परीक्षा में रैंक 1 प्राप्त किया उसके लिए वो निश्चित ही बधाई के पात्र हैं, लेकिन सिर्फ एक सफलता के आधार पर उन्हें अचानक से अपनापन दिखाना कितना उचित है? ये जानकारी होनी चाहिए कि शुभम वर्तमान में बतौर IDAS प्रोबेशनर कार्यरत हैं और ये पद भी उन्होंने 2019 में यूपीएससी एग्जाम देकर ही पाया था। सवाल ये है कि क्या उस वक़्त वो ‘बिहार के बेटे’ कहलाने योग्य इसलिए नहीं थे क्यूंकि रैंक १ नहीं आया था? रैंक १ के सिवा बाकी सारे लोग जो यूपीएससी की परीक्षा में उत्तीर्ण हो रहे हैं उनका सम्मान क्यों नहीं?

कुछ वर्षों पहले ऐसी ही खुशी की लहर पूरे देश में दौड़ गयी थी जब सुन्दर पिचाई को गूगल का सीईओ बनाया गया था, अचानक से सुन्दर पिचाई के भारतीय मूल की चर्चा होने लगी थी। कमला हैरिस के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। सुन्दर पिचाई भले ही IIT खड़गपुर से शिक्षित हों, पर क्या वो ये कह सकते हैं कि आज भारतीय विश्वविद्यालय का स्तर अंतर्राष्ट्रीय मानकों का है? कमला हैरिस का न जन्म भारत में हुआ और न ही शिक्षा, फिर भी सोशल मीडिया पर लोगों की होड़ लगी थी कि एक भारतीय ने अमेरिका में अपना परचम लहराया। अपनी सच्चाई को छुपा कर हम सफल लोगों को और सफल कहानियों को क्यों अपना लेते हैं?

बिहार के बेटे की तरक्की, पर बिहार का क्या?

एक और विषय ये है कि शुभम ने अपनी पढाई IIT Bombay से पूरी की है, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से नहीं। बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति आज भी उतनी ही जर्जर है। शुभम जैसे कई और ‘बिहार के बेटे’ ने कई वर्षों तक यूपीएससी की परीक्षा में अच्छे रैंक प्राप्त किये हैं, पर बिहार की स्थिति में कोई विकास नहीं हुआ।

सफलता को सदैव मेरा सलाम है लेकिन क्या सफल लोगों के आधार पर सामाजिक मुद्दों को अनदेखा करना जायज़ है? जर्ज़र शिक्षा व्यवस्था, भ्रष्टाचार, जातिवाद ये शब्द आज भी बिहार के लिए उपयुक्त हैं। आज भी लाखों की संख्या में छात्र अपना घर छोड़ कर बिहार से बाहर जा रहे हैं ताकि उन्हें अच्छी शिक्षा और अच्छी नौकरी मिल सके। वर्षों से बिहार के छात्र भारतीय प्रशानिक सेवा में उत्तीर्ण हो रहे हैं, पर आज भी व्यवस्था परिवर्तन की कोई बात नहीं करता।

‘बिहार का बेटा’ होना निश्चय ही गर्व का विषय है पर इतने बड़े दायित्व के निर्वहन की जिम्मेदारी भी आवश्यक है। बेटा कहलाने और बेटा होने में बहुत फर्क है। अगर आपको राज्य के बेटे होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है तो आपकी निष्ठा राज्य के विकास की ओर भी होनी चाहिए ताकि भविष्य में बिहार के बेटे कहलाने वालों को अच्छी नौकरी और अच्छी शिक्षा के तलाश में भटकना न पड़े।

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