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लैंगिक असमानता: स्त्री समाज की सबसे बड़ी मोहरा

Ritu Rani

ByRitu Rani

Oct 12, 2020

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लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है । पारंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण , अपमान और भेदभाव से पीड़ित होती हैं । महिलाओं के खिलाफ भेदभाव दुनिया में हर जगह प्रचलित है । अमेरिका की राजनीतिज्ञ हेलिरी क्लिंटन ने कहा कि – “महिलाएँ संसार में सबसे अप्रयुक्त भंडार हैं”।

भारत में लैंगिक असमानता

हम 21वीं शताब्दी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं जो एक बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाते हैं और यदि एक बेटी का जन्म हो जाये तो शान्त हो जाते हैं यहाँ तक कि कोई भी जश्न नहीं मनाने का नियम बनाया गया है । लड़के के लिये इतना ज्यादा प्यार कि लड़कों के जन्म की चाह में हम प्राचीन काल से ही लड़कियों को जन्म के समय या जन्म से पहले ही मारते आ रहे हैं , यदि सौभाग्य से वो नहीं मारी जाती तो हम जीवनभर उनके साथ भेदभाव के अनेक तरीके ढूँढ लेते हैं । ये भेदभाव अधिकांशतः तब प्रचण्ड रूप लिया जब बेटियों के शादी के वक्त दहेज लेने की प्रथा दबाव देकर ली जाने लगी । हमारे समाज में उस वक्त से ही बेटों के होने पर खुशी और बेटियों के होने पर बोझ समझा जाने लगा ।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति प्राचीन या वैदिक काल में सुदृढ़ थी उस समय महिलाओं को सभा और समिति जैसी सामाजिक संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व मिलता था । इसके अतिरिक्त अपाला और लोपामुद्रा जैसी महिलाओं ने वेदों की रचना में भी योगदान दिया । वेदों में कहा गया है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवताह”। इसका अर्थ है -“जहां पर नारी को सम्मान दिया जाता है वहां देवताओं का वास होता है”। लेकिन मनुस्मृति के तहत ये कहा गया है कि “नारी को हमेशा पुरुषों के अधीन रहना चाहिए”। नारी को विभिन्न स्थितियों में पहले बेटी , फिर स्त्री और उसके बाद माँ के रूप में रखा गया है । लेकिन परवर्ती वैदिक काल में महिलाओं की स्थिति लगातार कमज़ोर होती गई । सुल्तानी काल में अफगानी और मुसलमानों का आगमन भारत में हुआ । उनके चलन के अनुसार , नारियों को बुर्खा पहनने की प्रथा शुरू की गई । मुगल काल में भी यही प्रथा का चलन रहा । मुगल काल के समय फ्रैंकोइस बेरनियर ( Francois Bernier ) आए थे जो इसका तीव्र विरोध और आलोचना किया था । इन सारे नियम और प्रथा के बारे में एक चिट्ठी लिख कर अपने राजा को बताया कि – “यहां पर इतने बुरे नियम है कि इन नियमों के साथ शायद ही कोई महिला आगे जा सकती है “। इसके पश्चात लॉर्ड डलहौजी ( Lord Dalhousie ) का आगमन हुआ , जिन्होंने ऐसे नियमों और प्रथाओं का तीव्र विरोध किया था । लॉर्ड डलहौजी ने 1856 में विधवाओं के विवाह के लिए नियम बनाए और अत्याचारित होने से बचने के लिए प्रोत्साहन दिया । साथ ही साथ लॉर्ड विलियम बेंटिक ( Lord William Bentinck ) ने सती प्रथा और बाल विवाह पर रोक लगा दिया । उस वक्त जॉन स्टुअर्ट मिल ( John Stuart Mill ) सबसे बड़े नारीवादी हुआ करते थे , जिन्होंने इसके विरोध में आवाज उठाई और 1920 में यूरोप में महिलाओं को वोट डालने का अधिकार मिला । फिर इसका प्रभाव भारत में पड़ा । जब 1947 में सर्वे की गई तो पता चला कि 15 प्रतिशत महिला ही शिक्षित है । उसके बाद जब 2011 में सर्वे की गई तो पता चला कि शिक्षित महिला का दर 56.05 प्रतिशत है । आधुनिक युग तक नारियों पर बहुत अत्याचार हुए हैं । मुख्य न्यायाधीश दीपक मिस्र के दादा जी गोदाबरिश मिस्र ने लिखा है कि उस वक्त नारियों से ज्यादा पुरुषों की प्रधानता थी और हिन्दू समाज में लड़कियों का पैदा होना श्राप माना जाता था क्योंकि लड़कियों को उतने वर्ष तक बिना शादी के नहीं रख सकते , जितने वर्ष तक लडक़ों को रख सकते हैं और समाज हमेशा लड़कियों के चरित्र पर नजर रखती है । गोदाबरिश मिस्र ने लिखा था -“पुरुषों का जो दोष उनकी पुरुषता को जाहिर करता है , वही दोष स्त्री का चरितृक्षखलन माना जाता है “। ऐसी परिस्थितियों में आधुनिक काल के कुछ बुद्धजीवियों द्वारा भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान लैंगिक समानता हेतु किये गए प्रयास अत्यधिक प्रशंसनीय रहे तथा इन प्रयासों से महिला समानता की नवीन अवधारणा का उद्भव हुआ एवं स्वतंत्रता के पश्चात् निर्मित भारतीय संविधान में भी महिलाओं के सशक्तीकरण से संबंधित विभिन्न प्रावधान किये गए ।

लैंगिक असामनता के आंकड़ें

विश्व आर्थिक मंच ( World Economic Forum ) के अनुसार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसर, शैक्षिक उपलब्धियों, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा तथा राजनीतिक सशक्तीकरण के सूचकांकों के मिले-जुले आकलन में विश्व में भारत का स्थान 87वाँ है । देश के श्रमबल में महिलाओं की घटती भागीदारी और संसद में महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व चिंतनीय है । लिंगानुपात एक अति संवेदनशील सूचक है जो महिलाओं की स्थिति को दर्शाता है । निरंतर कम होते लिंगानुपात के कारण जनसंख्या में असंतुलन पैदा होता है जिससे महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ने जैसी अनेक सामाजिक समस्याएँ पैदा होती हैं ।
वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक – 2020 में भारत 91/100 लिंगानुपात के साथ 112वें स्थान पर रहा । उल्लेखनीय है कि वार्षिक रूप से जारी होने वाले इस सूचकांक में भारत पिछले दो वर्षों से 108वें स्थान पर बना हुआ था। इस सूचकांक के विभिन्न मानकों जैसे – स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के क्षेत्र में भारत को 150वाँ, आर्थिक भागीदारी और अवसर क्षेत्र में भारत को 144वाँ स्थान , शैक्षिक अवसरों की उपलब्धता के क्षेत्र में भारत को 112वाँ स्थान तथा राजनीतिक सशक्तीकरण और भागीदारी में अन्य बिंदुओं की अपेक्षा बेहतर स्थिति के साथ भारत को 18वाँ स्थान प्राप्त हुआ । इस सूचकांक में आइसलैंड को सबसे कम लैंगिक भेदभाव करने वाला देश बताया गया । विश्व आर्थिक मंच के अनुमान के अनुसार , विश्व में फैली व्यापक लैंगिक असमानता को दूर करने में लगभग 99.5 वर्ष लगेंगे ।

लैंगिक असामनता के कारक

1. लैंगिक असामनता का मुख्य कारक यहां की पितृसत्तात्मक व्यवस्था से है । पितृसत्तात्मकता सामाजिक संरचना की ऐसी प्रक्रिया और व्यवस्था हैं , जहां महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहना पड़ता है । प्राचीन भारतीय हिन्दू कानून के निर्माता मनु के अनुसार, “ऐसा माना जाता हैं कि औरत को अपने बाल्यकाल में पिता के अधीन , शादी के बाद पति के अधीन और अपनी वृद्धावस्था या विधवा होने के बाद अपने पुत्र के अधीन रहना चाहिये । किसी भी परिस्थिति में उसे खुद को स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं हैं”।
2. लैंगिक असमानता रोजगार के क्षेत्र में काफी देखा गया है । जहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है और कम कौशल की नौकरियां पेश की जाती है ।
3. मानकों पर महिलाओं की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा कमज़ोर है । हालाँकि लड़कियों के शैक्षिक नामांकन में पिछले दो दशकों में वृद्धि हुई है तथा माध्यमिक शिक्षा तक लिंग समानता की स्थिति प्राप्त हो रही है लेकिन अभी भी उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं का शैक्षिक नामांकन पुरुषों की तुलना में काफी कम है ।
4. लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा । इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में अधिकांश महिलाएँ वर्तमान में नौकरी के लिये आवश्यक कौशल की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं ।
5. महिलाओं के साथ असमानता और भेदभाव का व्यवहार उसके परिजन और उसके घर से होता है । जब भी बेटों का जन्म होता है तो घरवाले उन्हें खिलौने के तौर पर गाड़ियां देते हैं और बेटियों को गुड्डे और गुड़िया दी जाती है जहां से लड़कियों के मन में शादी और घर संभालने जैसी कल्पना बैठ जाती है जहां उनकी शिक्षा कमजोर पड़ जाती है ।
6. समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति होने के कुछ कारणों में अत्यधिक गरीबी भी है । गरीबी की कमी के कारण बहुत सी महिलाएँ कम वेतन पर घरेलू कार्य करने , वैश्यावृत्ति करने या प्रवासी मज़दूरों के रूप में कार्य करने के लिये मजबूर हो जाती हैं ।

वर्तमान परिस्थिति

वर्तमान स्थिति में महिलाओं के साथ भेदभाव में सुधार तो हुआ है लेकिन पुरुषों की तुलना में अब भी सहभागिता कम है । जब महिलाएं घरों से निकलकर कार्यस्थलों पर नौकरियां करने आई तो कार्यस्थल पर लैंगिक रूप से उत्पीड़न या यौन उत्पीड़न का शिकार हुई । वर्ष 2017 – 2018 के नवीनतम आधिकारिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey) के अनुसार , भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं श्रम शक्ति (Labour Force) और कार्य सहभागिता (Work Participation) दर कम है । ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक मापदंड पर महिलाओं की आत्मनिर्भरता पुरुषों पर बनी हुई है । देश के लगभग सभी राज्यों में वर्ष 2011-12 की तुलना में वर्ष 2017-18 में महिलाओं की कार्य सहभागिता दर में गिरावट देखी है । इस गिरावट के विपरीत केवल कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों जैसे मध्य प्रदेश , अरुणाचल प्रदेश , चंडीगढ़ और दमन-दीव में महिलाओं की कार्य सहभागिता दर में सुधार हुआ है ।

कानूनी प्रावधान

लैंगिक असमानता को ख़त्म करने के लिए हमारे संविधान में कई प्रावधान बनाए गए हैं । ऐसे बहुत सारे कानून है जहां सारे व्यक्ति को समानता का अधिकार देता है । इसमें शामिल प्रावधान है – अनुच्छेद 14 , अनुच्छेद 15 , अनुच्छेद 16 और इसके अतिरिक्त वोट डालने का अधिकार । हमारा संविधान नागरिकों के लिए स्तर की समानता और अवसर प्रदान करती है । इसी क्रम में महिलाओं को भी वोट डालने का अधिकार प्राप्त हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है – “भारत राज्य – क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से अथवा विधियों के समान संरक्षण से राज्य द्वारा वंचित नहीं किया जायेगा।” भारत के प्रत्येक व्यक्ति को समानता का अधिकार प्रदान करता है , जो कि देश के सभी नागरिकों के बीच अयुक्तियुक्त विभेद को वर्जित करता है । संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है – “राज्य किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं कर सकता है”। संविधान का अनुच्छेद 15 ( 3 ) कहता है – ” राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध ( Provision ) करने से निवारित ( Prevented ) नहीं करेगी “। संविधान का अनुच्छेद 15 ( 4 ) कहता है – “राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी”। संविधान का अनुच्छेद 16 ( 1 ) कहता है – “राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी”। संविधान का अनुच्छेद 16 ( 2 ) कहता है – “राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा”। भारत में महिलाओं के लिये बहुत से संवैधानिक सुरक्षात्मक उपाय बनाये हैं । इन सभी प्रावधानों के बावजूद देश में महिलाएं के साथ आज भी द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रुप में व्यवहार किया जाता हैं , पुरुष उन्हें अपनी कामुक इच्छाओं की पूर्ति करने का माध्यम मानते हैं , महिलाओं के साथ अत्याचार अपने खतरनाक स्तर पर हैं , दहेज प्रथा आज भी प्रचलन में हैं , कन्या भ्रूण हत्या आज भी कई जगहों पर प्रचलित है ।

लैंगिक असामनता समाप्त करने के प्रयास

1. समाज की मानसिकता में धीरे-धीरे परिवर्तन आ रहा है जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर गंभीरता से विमर्श किया जा रहा है । तीन तलाक, हाज़ी अली जैसे मुद्दों पर सरकार तथा न्यायालय की सक्रियता के कारण महिलाओं को उनका अधिकार प्रदान किया जा रहा है ।
2. राजनीतिक प्रतिभाग के क्षेत्र में भारत लगातार अच्छा प्रयास कर रहा है इसी के परिणामस्वरुप वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक- 2020 के राजनीतिक सशक्तीकरण और भागीदारी मानक पर अन्य बिंदुओं की अपेक्षा भारत को 18वाँ स्थान प्राप्त हुआ ।मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी पहले से बढ़कर 23% हो गई है तथा इसमें भारत , विश्व में 69वें स्थान पर है ।
3. महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिये 2005 से भारत ने औपचारिक रूप से वित्तीय बजट में जेंडर उत्तरदायी बजटिंग ( Gender Responsive Budgeting- GRB ) को अंगीकार किया था । जीआरबी का उद्देश्य है – राजकोषीय नीतियों के माध्यम से लिंग संबंधी चिंताओं का समाधान करना ।
4. ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’, ‘वन स्टॉप सेंटर योजना’, ‘महिला हेल्पलाइन योजना’ और ‘महिला शक्ति केंद्र’ जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तीकरण का प्रयास किया जा रहा है। इन योजनाओं के क्रियान्वयन के परिणामस्वरुप लिंगानुपात और लड़कियों के शैक्षिक नामांकन में प्रगति देखी जा रही है।
5. आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु मुद्रा और अन्य महिला केंद्रित योजनाएँ चलाई जा रही है।

लैंगिक समानता का सिद्धांत भारतीय संविधान की प्रस्‍तावना , मौलिक अधिकारों , मौलिक कर्तव्‍यों और नीति निर्देशक सिद्धांतों में प्रतिपादित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता का दर्जा प्रदान करता है अपितु राज्‍य को महिलाओं के पक्ष में सकारात्‍मक भेदभाव को ख़त्म करने की शक्‍ति भी प्रदान करता है। कुछ राजनीतिज्ञ ने असामनता का दोष नारियों को ही दिया है क्योंकि पुरुष चाहता है वो आगे रहे और जब तक नारी स्वयं आगे जाने की कोशिश नहीं करेगी , तब तक पुरुष नारियों को आगे जाने नहीं देंगे लेकिन माहिला खुद को आगे महसूस नहीं कर रही है , जिसकी वजह से पीछे हैं । एक पहलू यह भी है कि जब नारी स्वयं को कमजोर समझना बंद कर देगी तो पुरुष भी उन्हें कमजोर समझना बंद कर देंगे , लेकिन ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है । महिला और पुरुष के बीच अन्तर सिर्फ संस्कार का है। हमारे समाज में एक गलत प्रथा ये भी है कि वंश आगे बढ़ाने और मुखाग्नि देने के लिए लड़का चाहिए । मुखाग्नि लड़की नहीं दे सकती इसलिए सबसे पहले नारियों को पुरुषों से कम मान्यता मिली । प्रकृति द्वारा किसी भी प्रकार का लैंगिक विभेद नहीं किया जाता है । समाज में प्रचलित कुछ तथ्य जैसे – महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा जैविक रूप से कमज़ोर होती हैं इत्यादि केवल भ्रांतियाँ हैं। दरअसल महिलाओं में विशिष्ट जैविक अंतर , विभेद नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत्त विशिष्टाएँ हैं , जिनमें समाज का सद्भाव और सृजन निहित हैं। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारा सहभागी लोकतंत्र , आने वाले समय में और पुरुषों और महिलाओं के सामूहिक प्रयासों से लिंग असमानता की समस्या का समाधान ढूँढने में सक्षम हो जायेंगा और हम सभी को सोच व कार्यों की वास्तविकता के साथ सपने में पोषित आधुनिक समाज की ओर ले जायेगा ।

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