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हाँ मैं बेटी हूँ

Aduiti Shreya

ByAduiti Shreya

Oct 12, 2020

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man holding girl heading towards sea
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में बेटी हु ,
वही बेटी हु जो हाथरस में कानून के हाथो से जला दी गई,
में वही निर्भया हु जो 6साल तक इंसाफ मांगती रही ।
में वही आशफा हु , जो मंदिर में नीलम हो गई ,
में वही द्रोपती हु , जो घर में ही बिक गई ।

ऐसा देश है मेरा जहा धरती को माता मान चूमते हो , और उसी माँ की बेटी को कोख में ही मार डालते हो । ऐसा देश है मेरा जहा झांसी वाली रानी की मिसाल दी जाती है ,और वही घर से अकेले जाने से रोका जाता है | ऐसा देश है मेरा जहा हमने खुद को अंग्रेज़ो से आतंकवादियों से तो बचा लिया , मगर खुद की बेटियों को घर के आतंकियों से ना बचा सके ।
क्या बात कहु इस देश की जहा इंसाफ के लिए भटकना पड़ता है ,जहा कानून लड़की की नियत पर शक करता है , जहा की पुलिस नशे में धुत , रक्षक से भक्षक बन जाती है , छीने लेती है उस मासूम की मुस्कराहट ,चेहरा छुपाने पर करदेती है मजबूर ।

ऐसा देश है मेरा जहा के नेता लड़कियों में संस्कार डालने को कहते है | केहते है नेता जी हमारे लड़की अगर पहंने कपड़े कम , तो हो जाती है वो बेशरम , बुलावा देती है लड़को को ,करने अपनी मनमानी तब । नेता जी जरा यह बताए संस्कार क्या होता है , क्या है यह सिर्फ लड़की का गहना और लड़के है इस शब्द से अनजान ? संस्कार हमे यह नेता क्या समझेंगे , जिहोने दिए है रिश्वत हज़ार | न जाने इनके बेटो ने किया है कितनो का बुरा हाल | रिश्वत खिला अंधे कानून को किया है और अँधा |बन गई है बलात्कारी शेर , और मौन हो गई है जनता |

बेटी हो तुम ,
हो तुम घर की लाज ।
करना न कोई ऐसा काम,
जहा हो जाए इज़्ज़त नीलम ।

पापा कैसे बचाऊ खुद की लाज ,
जब घूम रहे है दरिंदे ,
भूखे लकड़ बाघे जैसे आज
देखते है हर बेटी को ,
गन्दी नज़र से आज |

मन करता करदु इन दरिंदो को ,
सड़को पर बदहाल ,
कुतर दू उसका जिस्म |
जैसे किया था उसने , उस चिड़िया का हाल ।
हर बेटी , हर औरत ,हर बहु किसी न किसी के घर की इज़्ज़त होती है , और इन दरिंदो के घर में भी इन इज़्ज़तो की मौजूदगी होती ही होगा ।क्या इन दरिंदो को ,दरिंदगी करते वख्त , उस चिड़िया के जिस्म को बदहाल करते वक़्त | क्या दरिंदो को जरा से भी दया नहीं अति होगी ? क्या उनके मन में अपने घर में मौजूद अपनी घर की इज़्ज़त का ख्याल नहीं अत होगा । क्या उसकी जान लेते वक़्त, उस मासुम के बदहाल चारे पर तरस नहीं आता होगा ? क्या वह यह नहीं सोचता होगा की उस चिड़िया के पिता , अपनी चिड़िया के घोसले में लौटने का इंतज़ार कर रहे होंगे । क्या उसे उस फूल को ज़िंदा जलने में थोड़ी सी दया भी नहीं अति होगी । क्या उसके सामने कभी अपने फूल का चेहरा न आया होगा | उसे इतनी भी दया न आई , की कोई पिता अपनी चिड़िया का इंतज़ार कर रहा होगा ,और वो अपनी चिड़िया की चहचहाट सुने को तरस जाएगा , क्या उसे एक बार यह न लगा की उस बाप का बगीचा सुना पड़ जाएगा अपनी चिड़िया के बिना |

हे भगवन इन दरिंदो के घर में एक फूल सी बेटी देना , ताकि उसे इस चिड़िया का महत्त्व समझ आए।
और भगवान अगर तू सचमे किस्मत लिखता है ,
तो कैसे किसी बेटी के किस्मत में बलात्कार लिख देता है ।
हे ईश्वर दया कर , मत लिख किसी बाप के चिड़िया की ऐसी किस्मत ,
मत छीने किसी के आंगन की चहचहाट ।

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