क्या हिंदी आज भी प्रासंगिक है?

क्या हिंदी आज भी प्रासंगिक है?


भारत में हिंदी महज़ एक भाषा नहीं है, बल्कि भारत की ज्यादातर आबादी की रोजी-रोटी है, कुछ की आदत है, कुछ की भावनाएं है तो किसी के लिए व्यपारिक पक्ष भी है। आज हिंदी की स्थिति कुछ हद तक एक भले मुक़ाम पर है क्योंकि अब हिंदी केवल बोली के रूप में ही नहीं दिखती बल्कि कई क्षेत्रों जैसे अनुवाद,व्यापार, विज्ञापन, सरकारी कार्यालयों, कॉरपोरेटों में भी दिखती है। हिंदी के इतिहास की बात करें तो 1918 में महात्मा गांधी द्वारा हिंदी हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राजभाषा बनाने को कहा गया था और 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। हिंदी भारोपीय परिवार की भाषाओं में आई है जिसमें अन्य प्रमुख भाषाएँ भी शामिल हैं जैसे बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, असमी, उड़िया, कश्मीरी, उर्दू, मैथिली और संस्कृति।


सभी भाषाएँ एक प्रकार का माध्यम होती हैं, जिनका प्रयोग संचार को पूरा करने के वास्ते किया जाता है। भारत के सभी राज्यों में हिंदी बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में से एक है। हिंदी का महत्व आज और भी बढ़ता चला जा रहा है। आज पूरी दुनिया में 175 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा पढ़ाई जा रही है, तकनीकी कंपनियां इस भाषा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। अन्य भाषाओं में लिखा साहित्य और ज्ञान-विज्ञान हिंदी में और हिंदी का अन्य भाषाओं में अनुदित किया जा रहा है। नए माध्यम के रूप में उभरे सोशल मीडिया और अन्य संचार माध्यमों में भी हिंदी ने अपनी जगह बना ली है। हिंदी भाषा एक ऐसा विशाल सागर है जो अन्य भाषाओं को भी आने अंदर समा लेता है जैसे हिंदी ने अंग्रेजों, उर्दू फ़ारसी आदि के सब्दों को अपनाया है। आज मुश्किल से ही कोई हिंदी में केवल हिंदी के शब्दों का प्रयोग करता होगा अन्यथा हिंदी में थोड़ी अंग्रेजी और उर्दू के शब्द मिल ही जाते हैं। ऐसे में हिंदी की प्रासंगिकता या उसके वजूद के ख़त्म होने का सवाल बनता है। लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि हिंदी समेत बंगला, तेलगु, मराठी, कन्नड़, गुजराती, पंजाबी आदि भाषाएँ ऐसी हैं जो भारत की पहली 30 भाषाओं में से हैं जो कम से कम एक हज़ार साल पुरानी हैं और लगभग 2 करोड़ से भी अधिक लोगों द्वारा बोली जाती हैं।

आज के दौर में हिंदी युवाओं के बीच भी काफ़ी लोकप्रिय भाषा के रूप में भी उभर रही है। कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हो युवा हर जगह हिंदी में पोस्ट कर रहे हैं, हिंदी में रुचि दिख रहे हैं। किसी पद के लिए आवेदन करना हो तो रिज्यूम भी हिंदी में भी बनाये जा रहे हैं, जबकि रिज्यूम अंग्रेजी में होते थे। जैसे अंग्रेजी का डायलॉग है कि, “आई कैन टॉक इंग्लिश, आई कैन वॉक इंग्लिश” ऐसे ही भारत में हिंदी बोली भी जाती है, लिखी भी जाती है, पढ़ी भी जाती है, भारतीय सांस भी हिंदी में लेते हैं, कहना भी हिंदी में खाते हैं, उन्हें प्यार भी हिंदी में होता और दर्द भी हिंदी में ही। सुमित्रानंदन पंत जी का हिंदी को लेकर यह कथन बिल्कुल सच है कि हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्त्रोत है।

जैसे जैसे हिंदी अपने विकास पथ पर बढ़ रही है उसकी तरह उसमें रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। आज ज्यादातर कंपनियां अपने माल की बिक्री, विज्ञापन, और प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का ही इस्तेमाल कर रही हैं। भारत के अलावा नेपाल, भूटान, मलेशिया, थाईलैंड, हॉंगकॉंग, सिंगापुर, फ़िजी, मोरिशस, ट्रिनीडाड, गायन, सूरीनाम, इंग्लैंड, कनाडा और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में भी हिंदी भाषी प्रचुर संख्या में हैं। इन्हीं में से कुछ प्रवासी लेखक बाहरी देशों में भी हिंदी साहित्य का सृजन कर रहे हैं। गंगाप्रसाद अग्निहोत्री का कथन है कि “किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है”। और इसी से हिंदी की प्रगति का पैमाना भी मापा जा सकता है।

हिंदी की व्यपकता के साथ साथ उसके शैक्षणिक स्तर का भी विकास हुआ है। वह लोग जो हिंदी प्रेमी हैं या हिंदी से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं उनके लिए हिंदी के कैरियर में कई विकल्प हैं जो वह कर सकते हैं। जैसे:

  1. हिंदी में एम.ए करने के बाद हिंदी का अध्यापक बन सकते हैं।
  2. पत्रकारिता के क्षेत्र में जा सकते हैं।
  3. लेखक/कवि/उपन्यासकार बन सकते हैं।
  4. अनुवादक बन सकते हैं या इंटरप्रिटेशन कर सकते हैं।
  5. भाषण लेखक बन सकते हैं।
  6. कंटेंट लेखक बन सकते हैं।
  7. वॉइस ओवर आर्टिस्ट बन सकते हैं।
  8. विज्ञापम एजेंसी में काम लर सकते हैं।
  9. स्क्रिप लेखक बन सकते हैं।
  10. शोधकर्ता भी बन सकते हैं।

जन प्रासंगिकता के साथ साथ हिंदी का प्रचार एवं उपयोग सरकार के स्तर पर भी होना आवश्यक है। हिंदी का भविष्य इसी में निहित है।

Comments

Vidya Sharma

लिखना एक कला है, और हम इस कला के प्रयासरत हैं। नाम है विद्या शर्मा।